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Monday, November 1, 2010

Indira Gandhi: Life in Pictures


On 31 October 1984, two of Gandhi's bodyguards, Satwant Singh and Beant Singh, assassinated Indira Gandhi with their service weapons in the garden of the Prime Minister's Residence at No. 1, Safdarjung Road in New Delhi.

Indira Gandhi: Life in Pictures


She was cremated on 3 November near Raj Ghat.

मोक्ष के लिए बर्लिन से हरिद्वार


हर की पौडी में गंगा के तट पर चार साल का एक नन्हा बालक अपने पिता की अस्थियाँ विसर्जित कर रहा है। पिता की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के साथ। पंडित संस्कार करा रहे हैं और निकट ही आँखों में आँसू लिए उसकी माँ और कुछ परिजन भी हैं। किसी हिंदू परिवार के लिए मत्यु के बाद ये जरूरी संस्कार है लेकिन यहाँ दिलचस्प ये है कि ये बालक हिंदू नहीं जर्मन है।
जी हाँ, सात समंदर पार से ये परिवार गंगा और हिंदू रीति-रिवाज में अपनी आस्था और विश्वास के कारण ही जर्मनी से भारत आया है। जर्मनी के बर्लिन शहर की रहनेवाली मेस्टर बूर के पति का निधन पिछले महीने हो गया था। वो कैंसर से पीड़ित थे और सिर्फ 40 वर्ष के थे और मेस्टर के अनुसार प्राच्य दर्शन से प्रभावित थे और हिंदू संस्कारों का अक्सर जिक्र किया करते थे।
आस्था : उनके निधन के बाद मेस्टर को लगा कि गंगा में अपने पति की अस्थियाँ विसर्जित करके ही वो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएँगी। इसलिए उन्होंने हरिद्वार आने का फैसला किया। मेस्टर बूर की खुद भी भारतीय दर्शन और धार्मिक चिंतन में गहरी आस्था है। मेस्टर कहती हैं, 'मेरे पति को मौत से पहले काफी कष्ट सहना पड़ा और मैं चाहती थी कि उनकी आत्मा सारे कष्टों से मुक्त हो जाए इसलिए मैं गंगा की शरण में आई। मैंने यहाँ हिंदू पुरोहितों से बात की और उन्होंने मुझे ये संस्कार करने की सलाह दी।'
मुझे बताया गया कि ये संस्कार बेटे के हाथ से ही होना चाहिए इसलिए मैं अपने बेटे को लेकर यहाँ आई। मेस्टर बूर के लिए ये एक भाव विह्वल कर देने वाला क्षण था और उनके चेहरे पर असीम संतोष के भाव थे। हिंदू संस्कारों के प्रति मेस्टर का आग्रह इतना ज्यादा है कि उन्होंने ईसाई होने के बावजूद अपने पति का दाह संस्कार करवाया उनके शरीर को दफनाया नहीं।
हरिद्वार में उनका संस्कार कराने वाले प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष प्रतीक मिश्रपुरी कहते हैं, 'विदेशी तो हमारी संस्कति के प्रति समर्पित हो रहे हैं। वो इनका महत्व समझ रहे हैं, लेकिन खुद भारतीय अपने संस्कारों से विमुख हो रहे हैं।' हिंदू वैवाहिक परंपरा के प्रति विदेशियों का आकर्षण नई बात नहीं है, लेकिन हिंदू तरीके से अंतिम संस्कार कराना विरल घटना है। लिहाजा हरिद्वार के पुरोहित समाज में तो ये सुर्खियों में है ही आम लोगों में भी इसकी खूब चर्चा है।

60 साल बाद आई है दो अमावस्या वाली दिवाली


इस बार की दीपावली बेहद खास है। 5 नवंबर को 60 साल बाद दो अमावस्याओं वाला योग बन रहा है। ज्योतिष के जानकारों का कहना है कि यह निवेशकों के लिए शुभकारी होगा, वहीं देश में इसके कारण राजनीतिक अस्थिरता और महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए धन कुबेर और लक्ष्मी का पूजन पूर्ण रूप से फल देने वाला साबित होगा।
दीपावली पर अमावस्या दोपहर बाद 1:02 बजे शुरू होगी और गोवर्धन पूजन के दिन शनिवार को 10:22 मिनट तक रहेगी। पर्व स्वाति नक्षत्र शुक्रवार के दिन शुक्र की राशी में आ रहा है। इस दिन सूर्य भी शुक्र की राशी में होगा। इसके कारण मुद्रास्फीति की दर में परिर्वतन के आसार हैं। हालांकि वर्षों बाद पुण्य नक्षत्र का महा मुहूर्त दिनभर रहेगा। इस दिन प्रॉपर्टी, सोना-चांदी, बर्तन, कपड़ा, वीइकल, इलेक्ट्रॉनिक आइटमों की खरीद करने वाले फायदे में रहेंगे।
अग्रवाल कॉलेज बल्लभगढ़ के लेक्चरर और ज्योतिषाचार्य डॉ. बांके बिहारी के अनुसार दीपावली पर दो अमावस्या का योग 60 वर्ष बाद बन रहा है। दीपावली और गौवर्धन पर अमावस्या काल में पूजन लाभकारी होता है। इस योग में की जाने वाली पूजा शनि की पीड़ा से छुटकारा दिलाएगी। शनिवार सुबह 10:22 मिनट तक अमावस्या रहने तक दिवाली का त्यौहार रहेगा।
शनिवार की अमावस्या में दीपावली पर शनि सिद्धि भी संभव है। दीपावली के दिन व्यापारी कुंभ लग्न में दोपहर बाद 1:42 से 3:07 बजे तक पूजन कर सकेंगे। गृहस्थ लोगों के लिए वृष लग्न में शाम 6:02 बजे से 7:56 बजे तक पूजन का समय रहेगा। साधना के लिए सिंह लग्न में रात को 12:33 से 2:53 बजे तक समय निर्धारित है। शनिवार सुबह 10:22 बजे तक पितरों के स्थान की पूजा की जा सकेगी।
डॉ. बांके बिहारी ने बताया कि इस योग के कारण राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है। दूसरी ओर यह योग सोना, चांदी व अन्य धातुओं को महंगा करेगा वहीं खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग होने वाले गुड, शक्कर जैसी कई जरूरी चीजों को भी महंगा कर सकता है। इस योग के कारण उत्तर भारत में भयंकर सर्दी का प्रकोप आ सकता है। लक्ष्मी जी की पूजा, हिंदुओं के व्रत और त्योहार सूर्य एवं चंद्रमा की स्थितियों को ध्यान में रख कर मनाए जाते हैं। सूर्य आत्मा का प्रतीक है, उसी प्रकार चंद्रमा मन का। दीपावली पर सूर्य एवं चंद्रमा दोनों एक ही राशि में होते हैं, जिससे अमावस्या का योग बन जाता है। अमावस्या पर चंद्रमा के सूर्य में अस्त हो जाने से चंद्रमा शून्य अंश का हो जाता है। इसके प्रभाव से मन शांत एवं स्थिर होता है, तभी महालक्ष्मी का पूजन सफल होता है।

Friday, October 22, 2010

शरद पूर्णिमा : चाँदनी रोशनी में खीर बनेगी अमृत


शरद ऋतु, पूर्णाकार चंद्रमा, संसार में उत्सव का माहौल और पौराणिक मान्यताएँ। इन सबके संयुक्त रूप का यदि कोई नाम या पर्व है तो वह है 'शरद पूनम'। वह दिन जब इंतजार होता है रात्रि के उस पहर का जिसमें 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत की वर्षा धरती पर करता है। वर्षा ऋतु की जरावस्था और शरद ऋतु के बालरूप का यह सुंदर संजोग हर किसी का मन मोह लेता है। आज भी इस खास रात का जश्न अधिकांश परिवारों में मनाया जाता है।
इसके महत्व और उल्लास के तौर-तरीकों को संबंध में ज्योतिषाचार्य प्रेमनारायण शास्त्री के अनुसार शरद पूनम का महत्व शास्त्रों में भी वर्णित है। वे बताते हैं कि इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। मान्यता तो यह भी है कि इस तरह रोगी रोगमुक्त भी होता है। इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है।
इस संबंध में स्मिता हार्डिकर बताती हैं कि उनके परिवार में शरद पूनम के दिन एक और जहाँ चंद्रमा की पूजा कर दूध का भोग लगाते हैं वहीं अनंत चतुर्दशी के दिन स्थापित गुलाबाई का विसर्जन भी किया जाता है। इस दिन परिवार के सबसे बड़े बच्चे की आरती उतारकर उसे उपहार भी दिया जाता है। शरद पूर्णिमा पर घर में कन्याओं को आमंत्रित कर गुलाबाई के गीत गाए जाते हैं।
प्राचीन काल से शरद पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है। शरद पूर्णिमा पर चाँद अपनी पूर्ण कलाएँ लिए होता है। मान्यता है कि इस दिन केसरयुक्त दूध या खीर चाँदनी रोशनी में रखने से उसमें अमृत गिर जाता है। यह पर्व शुक्रवार को धूमधाम से मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य पं. जी.एम. हिंगे के अनुसार शरद पूर्णिमा को कोजागिरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन चंद्र भगवान की तथा भगवान भोलेनाथ की पूजा सायंकाल के समय करके केसरयुक्त दूध या खीर का भोग रात को लगाते हैं। इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कलाएँ लिए होता है।
ऐसी मान्यता है कि चंद्रमा की सारी कलाएँ रात्रि के समय इस धरती पर बिखरती हैं, इसलिए रात्रि के समय दूध या खीर चंद्रमा को भोग के रूप में खिलाते हैं, जिससे चंद्रमा की अमृतमय किरणें इस खीर पर पड़ती हैं। इस खीर को पूजा-अर्चना व भजन-कीर्तन के बाद सभी लोगों में वितरण की जाती है। इस अमृतमय खीर पान से मनुष्य की उम्र बढ़ती है। इसके बाद से हेमंत ऋतु का प्रारंभ हो जाता है।
चामेलिका कुंडू बताती हैं कि शरद पूर्णिमा को कोजागौरी लोक्खी (देवी लक्ष्मी) की पूजा की जाती है। चाहे पूर्णिमा किसी भी वक्त प्रारंभ हो पर पूजा दोपहर 12 बजे बाद ही शुभ मुहूर्त में होती है। पूजा में लक्ष्मीजी की प्रतिमा के अलावा कलश, धूप, दुर्वा, कमल का पुष्प, हर्तकी, कौड़ी, आरी (छोटा सूपड़ा), धान, सिंदूर व नारियल के लड्डू प्रमुख होते हैं। जहाँ तक बात पूजन विधि की है तो इसमें रंगोली और उल्लू ध्वनि का विशेष स्थान है।
अनादिकाल से चली आ रही प्रथा का आज फिर निर्वाह किया जाएगा। स्वास्थ्य और अमृत्व की चाह में एक बार फिर खीर आदि को शरद-चंद्र की चाँदनी में रखा जाएगा और प्रसाद स्वरूप इसका सेवन किया जाएगा। शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंदिरों में गरबा-डांडिया का आयोजन के बाद प्रसाद के रूप में खीर का वितरण होगा।