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Tuesday, November 1, 2011

जीवन में असफलता भी जरूरी है


'यदि आप रसातल में पहुंच चुके हैं तो आप खुशकिस्मत हैं कि अब आपकी यात्रा केवल एक ही दिशा में होगी और वह है ऊपर की ओर।' अनूठे सकारात्मक चिंतन को दर्शाता 'नार्मन विसेंट पील' का उक्त मूलमंत्र असफलताओं से घिरे व्यक्ति की इच्छा-शक्ति को जगा सकता है।
असफलता एक सामान्य प्रक्रिया है और यदि असफलताओं को सकारात्मक नजरिए से देखा जाए तो ये बेहद रचनात्मक साबित हो सकती है। यदि आप भी असफलताओं के दौर से गुजर रहे हैं तो ये कुछ कारगर उपाय अपना सकते हैं:-
कहते हैं हर बाधा के पार एक अवसर इंतजार करता है। बस आप उम्मीद का दामन थामे रहिए। असफलता के कड़वे घूंट में सृजन के तत्व समाए रहते हैं। इसलिए बहुत बार असफलता किसी महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य की शुरुआत बन भाग्योदय की वजह बन जाती है। यदि आप असफलताओं के दौर में हैं तो धैर्यपूर्वक अपना उत्साह पूर्ववत कायम रखें।
हम अपनी छोटी-सी जिंदगी में ढेरों सपने संजोए रहते हैं। असफलता का दौर हमें अपने जीवन के लक्ष्यों से इतर सोचने का मौका देता है। इसलिए यह समय काफी अनुकूल साबित हो सकता है। इस समय किसी नई तकनीक या कला का प्रशिक्षण लिया जा सकता है। ऐसी कोशिशें न केवल नकारात्मकता के भाव को कुछ कम कर सकती हैं, बल्कि कुछ नया करने का एहसास उक्त समय की पीड़ा पर मरहम का काम करेगा और दिलो-दिमाग को एक नए रोमांच एवं अनुभूतियों से भर देगा।
एक प्रसिद्ध लेखक कहते हैं महान लोग वे भी हैं, जो इंतजार करते हैं। समय की ताकत का भरोसा कीजिए, क्योंकि बड़ी से बड़ी निराशा घोर मानसिक पीड़ा या भारी असफलाओं से उपजा दुख भी वक्त बीतने पर भर जाता है। वक्त हमेशा एक-सा नहीं रहता। बुरा वक्त यही दर्शाता है कि अब आपका अच्छा वक्त शुरू होने वाला है।
नाजुक दौर में अपनी दुख तकलीफें, किसी अपने के साथ बाँट लीजिए। इससे आप हल्का महसूस करेंगे। कहा जाता है कि कहने से दुख कुछ कम हो जाता है।
ऐसे दौर में आप हताश न हों, बल्कि स्वयं के लिए नई संभावनाएं तलाशें। एक रास्ता बंद होता है तो अनेक रास्ते खुल जाते हैं। याद रखें सबसे बड़ी हार स्वयं को हारा मान लेना है। अगर आपके मन में जुनून है तो उन्नाति का पथ बेहद विस्तृत एवं सीमाहीन होता है।

Friday, September 23, 2011

चरित्र में दृढ़ता, विचारों में प्रतिबद्धता लाएं


आज मुझे फिल्मी गीत की एक पंक्ति याद आ रही है, जिसे मैं आपके साथ शेयर करना चाहूंगा। इस गीत की पहली लाइन है-"जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ शाम।" कितनी सुन्दर पंक्ति है यह। थम जाने के बाद तो जीवन खत्म ही हो जाता है, फिर चाहे हमारा सीना सांस के आने-जाने से धौकनी की तरह फूलता-पिचकता ही क्यों न रहे। जब यहां मैं चलने की बात कह रहा हूं, तो वह शरीर के ही चलने की बात नहीं है, बल्कि उससे भी कहीं अधिक चेतना के चलने की बात है।
यह ऎसे चलने की बात है, जहां हम कहीं भी न तो थककर बैठते हैं और न ही घबराकर अपना रास्ता छोड़ देते हैं। यह वह चलना है, जब जीवन के हर पल को हम पूरे उल्लास से जीने की कोशिश करते हैं और यहां तक कि तब भी, जबकि हमें मालूम है कि अगले ही पल मृत्यु होने वाली है। मृत्यु के अंतिम क्षण तक को अपने कर्म से पकड़ लेना सही मायने में जिन्दगी भर चलते चले जाना है। तो इसके बारे में मैं आपको इतिहास की एक ऎसी सच्ची घटना सुनाने जा रहा हूं, जिस पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल होता है।
सनाका रोम के महान दार्शनिक और सम्राट नीरो के गुरू थे। उन्होंने नीरो को सम्राट बनाने में उसकी मां की मदद भी की थी। नीरो को शक हो गया कि उसके राजगुरू सनाका उसके विरूद्ध षडयंत्र कर रहे हैं। नीरो ने सनाका को राजदरबार में नस काटकर बूंद-बंूद रक्त के बहने से होने वाली मौत की सजा दी। सनाका ने घर जाकर परिवार से विदा लेना चाहा। लेकिन नीरो ने इसकी तक इजाजत नहीं दी। सनाका ने कहा-""दर्शन की पुस्तके मंगवा दो।"" उनकी यह इच्छा भी ठुकरा दी गई। तब उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा-""आ जाओ! हम दर्शन पर यहीं चर्चा करेंगे। इससे अच्छा अवसर भला और क्या होगा।"" सचमुच, मुझे विश्वास ही नहीं होता ऎसे लोगों के बारे में सुनकर कि ये सब किस धातु के बने हुए होंगे? कैसा होगा इनका मन और इनकी आत्मा कितनी अधिक शक्तिशाली होगी। ये वे लोग थे, जिन्हें यमराज तक नहीं डरा सका फिर भला जीवन की अन्य परेशानियां तो इन्हें क्या डरा पातीं।
महान दार्शनिक सुकरात और सनाका जैसे लोगों में यह जो शकित आती है, यह मूलत: उनके चरित्र की दृढ़ता और अपने विचारों की प्रतिबद्धता के कारण आती है। यदि हम अपने उद्देश्यों के प्रति संकल्पबद्ध हो जाते हैं, और संकल्पबद्ध होकर उसमें अपने-आपको पूरी तरह झोंक देते हैं, तो हमारे लिए कोई भी भय, भय नहीं रह जाता। हम अभय हो जाते हैं। तभी तो प्रेम दीवानी मीरा के लिए जहर का प्याला भी अमृत का प्याला बन गया था। मुझे लगता है कि हमें भी अपने जीवन में आत्मा की इस शक्ति को पाने के प्रयास करने चाहिए। ऎसा हो सकता है, इसमें कतई सन्देह नहीं है। अपनी चेतना में सात्विक भावों को स्थान देकर धीरे-धीरे हम इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।

नौकरी ढूंढना हुआ आसान


नौकरी के लिए कोई एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में नाम लिखवाता है तो कोई जॉब सर्चिग साइट्स पर खुद को रजिस्टर करता है। क ोई लगातार अखबारों में नौकरियों की तलाश करता है तो कोई मैगजीन्स में छपे जॉब एलर्ट खंगालता रहता है। नौकरी के लिए मची मारामारी में सही व्यक्ति तक उसकी योग्यता के अनुसार उपलब्ध नौकरी की सूचना पहुंच जाए यह आसान भी नहीं। क्योंकि अक्सर कम पढ़े लिखे और गरीब लोगों की पहुंच इन सारे माध्यमों तक भी मुश्किल ही होती है। इन समस्याओं को समझते हुए बंग्लोर के सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल ने एक ऎसा डिवाइस तैयार किया है जो एंप्लाई और एंप्लायर के बीच उपलब्ध नौकरियों से संबंधी सीधा संवाद स्थापित करता है, और वह भी बिना किसी जटिलता के।
अचानक मिली प्रेरणा
इस मशीन को बनाने की प्रेरणा राजन को उस समय मिली जब उन्हें एक कुक की तलाश थी। पास ही के किसी व्यक्ति ने उन्हें एक बूढ़ी औरत के बारे में बताया था, जिसे काम की जरूरत थी। वह उस व्यक्ति को अपना नंबर बूढ़ी औरत को देने का कह कर चला आया। लेकिन उस औरत से संपर्क ही दो सप्ताह के बाद हो सका। जब उसने राजन को फोन किया तब वह कुक रख चुका था। इस घटना ने राजन को सोचने पर मजबूर कर दिया कि शायद उस औरत को उस वक्त इस फोन कॉल के पैसे जुटाने में भी परेशानी उठानी पड़ी हो। तो ऎसा क्या जरिया हो सकता है जिससे एक गरीब व्यक्ति तक नौकरी की जानकारी समय रहते पहुंचाई जा सकें।
डिवाइस बनेगी मददगार
इस डिवाइस के लिए फ्री यूजर आईकार्ड बनवाते समय यूजर को अपने काम के बारे में बताना होगा। अपने पेशे की सही जानकारी देने से उन तक पहुंचने वाली नौकरियों को कैटेगराइज किया जा सकेगा। जैसे कोई माली होगा तो कोई नाई, कोई होम सर्वेँट होगा तो कोई धोबी। कॉलसेंटर डाटा बेस के जरिए उनके पेशों का रिकार्ड रखा जाएगा। इससे होगा यह कि जब अगली बार कोई व्यक्ति अपना यूजर कार्ड इंसर्ट करवाएगा, उसे उसकी योग्यता के अनुसार उपलब्ध नौकरियों की जानकारी मिल जाएगी।
ज्यादा नहीं कीमत
फिलहाल तो यूजर्स को मत्थुकत्थे के लिए कुछ भी भुगतान नहीं करना प्रड़ रहा, लेकिन आने वाले समय में प्रोजेक्ट के प्रसार के लिए रेवन्यू जुटाने के लिए यूजर्स को एक छोटी सी फीस देनी होगी। ताकि इसका और प्रसार किया जा सके। शुरूआती दौर में मत्थुकत्थे को बंग्लौर के मल्लेस्वर्म इलाके में लगाने की योजना है। साथ ही इसके पड़ोसी इलाक को भी इस डिवाइस से जोड़ा जाएगा। बस स्टैण्ड के पास लगाए जाने वाले इन बूथों तक ज्यादा से ज्यादा यूजर्स की पहुंच सुनिश्चित की जाने की योजना है।
एक नया प्लेटफार्म
अपने काम के लिए एंप्लाई तलाशने वाले लोगों के लिए यह एक नए प्लेटफार्म के रूप में है। एंप्लायर्स कॉल सेंटर को संपर्क करके अपने यहां उपलब्ध नौकरियों की लिस्टिंग करवा सकते हैं। इन नौकरियों की जानकारी मत्थुकत्थे के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का काम कॉल सेंटर करेगा। उपलब्ध रिक्ति की लिस्टिंग कराने में 150 रूपए की फीस एंप्लायर से ली जाएगी। इसके बाद मौजूद डाटा बेस के हिसाब से नौकरियों को वर्गीकृत किया जाएगा। फिर रजिस्टर्ड लोगों के प्रोफेशन्स के हिसाब से उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर नौकरियों की सूचना मत्थुकत्थे के जरिए पहुंचा दी जाएगी।
क्या है यह डिवाइस
नंदन राजन ने एक ऎसा डिवाइस तैयार किया है जो दिखने में एक बक्से जैसा है और उसमें सिर्फ दो ही बटन हैं। एक हरा और एक लाल। डिवाइस का नाम मत्थुकत्थे है, जिसका कन्नड़ में अर्थ है बातचीत। इसे एक पब्लिक टेलीफोन की तरह प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के लिए आपको एक मत्थुकत्थे आईकार्ड बनवाना होगा। इस कार्ड को इन्सर्ट करवाने से आपकी योग्यता अनुसार नौकरी से संबंधित सूचनाएं मिल सकती हैं।यह डिवाइस प्रयोग करने में सरल और सस्ती है। इस डिवाइस के चालू हो जाने पर इसमें रिकार्डिड आवाज के जरिए ऑप्शन चुनने के लिए कहा जाता है। स्वीकार करने के लिए हरे तथा दूसरे ऑप्शन पर जाने के लिए सिर्फ लाल बटन दबाना है।

बेसिक साइंस में है दम...


"बेसिक साइंस में जबरदस्त दम है। बीटेक की बात छोडिए.. अब कई नामचीन कम्पनीज अपने यहां बीएससी के स्टूडेंट्स को मौका दे रही हैं। स्टूडेंट्स को यदि कॅरियर की राह पकड़नी है तो यह सबसे अच्छा रास्ता है और देश के लिए कुछ करना हो तो भी साइंस रिसर्च महत्वपूर्ण है।"
देश के नामचीन संस्थानों में शामिल टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुम्बई के एटोमिक और मोलिक्यूलर साइंस के सीनियर प्रोफेसर डॉ. दीपक माथुर ने मंगलवार को जयपुर में यह बात कही। राजस्थान यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर डवलपमेंट ऑफ फिजिक्स एजुकेशन में डीएसटी की ओर से प्रायोजित "इंस्पायर कैम्प" में स्कूली बच्चों से मुखातिब हुए माथुर ने स्टूडेंट्स को बेसिक साइंस का महत्व बताते हुए इसमें जॉब अपॉच्र्यूनिटीज के बारे में जानकारी दी। पांचवें इंस्पायर कैम्प में राज्य के नवोदय विद्यालयों के स्टूडेंट्स शामिल हुए हैं।
विभिन्न तकनीकी सत्रों में पीलीभीत से आए डॉ. लक्ष्मीकांत और डॉ. उर्मिला शर्मा ने लाइव डेमोंस्ट्रेशन कर चमत्कारों की वैज्ञानिक सच्चाई बताई। जूलॉजी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. पी. के. गोयल ने स्टूडेंट्स को कॅरियर की दृष्टि से इस संकाय का महžव बताया। स्टूडेंट यदि बेसिक साइंस में आता है, तो जॉब तो मिलता ही है, साथ ही उस छात्र का नॉलेज लेवल बढ़ जाता है।
मापदंडों का पालन जरूरी
देश के हर बड़े शहर में अब दर्जनों बीटेक कॉलेज खुल गए हैं। जबरदस्त आक्रामक मार्केटिंग के चलते ये बच्चों को अपनी और लुभा रहे हैं, जबकि वहां स्तरीय शिक्षा नहीं मिल पा रही है। प्रो. दीपक माथुर का कहना है कि इन संस्थानों में स्टूडेंट्स के साथ धोखा हो रहा है। शायद ही किसी संस्थान में फैकल्टी के योग्यता मापदंडों का पालन किया जा रहा है।
लिंक जुड़े तो बदले तस्वीर
प्रो. माथुर ने बताया कि विज्ञान के क्षेत्र में विशेष कार्य कर रहे देश के नामचीन संस्थानों का यूनिवर्सिटीज से लिंक टूटा हुआ है। यह लिंक होना जरूरी है। इस वजह से ही यूनिवर्सिटीज के स्टूडेंट्स को कम अवसर मिलते हैं। अगर एक बार यह लिंक बन गया तो साइंस एजुकेशन की तस्वीर में बदलाव होगा और स्टूडेंट्स को फायदा मिलेगा।

यह सब होना चाहिए रेज्युमे में


बहुत से शोधों से पता चला है कि किसी एक वैकेंसी के लिए कंपनी या एम्प्लॉयर के पास करीब 500 रेज्युमे आते हैं। एक रेज्युमे पर नजर डालने के लिए रिक्रूटर के पास औसतन 30 से 40 सेकंड होते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो रिक्रूटर या कंपनी के एच आर को इंप्रेस करने के लिए आपके रेज्युमे के पास ज्यादा से ज्यादा आधा मिनट होता है। ऎसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारे रेज्युमे में ऎसा क्या खास हो कि वह अन्यों के मुकाबले में रिक्रूटर या एच आर का ध्यान खींचने में सफल हो सके।
पहली और अहम बात तो यह है कि योग्यता साबित करने के लिए रेज्युमे प्रभावशाली होना चाहिए। एक अच्छे रेज्युमे का यह गुण होता है कि वह आपकी गैरमौजूदगी में आपकी तरफदारी करता है, दूसरी ओर एक कमजोर रेज्युमे रिक्रूटर की निगाहों में आप्रांसगिक बना देता है। सो , जाने उन बातों को जिनको ध्यान में रखने से रेज्युमे बनता है , प्रभावशाली।
डिटेल्स:छोटा पर पूरा हो विवरण
रेज्युमे बनाते वक्त लेफ्ट साइड में सबसे ऊपर नाम लिखना चाहिए और उसके ठीक नीचे अपनी ईमेल आईडी और उसके नीचे फोन नंबर। कई लोग नाम के साथ ही जेंडर भी लिख देते हैं ऎसा न करें। जेंडर व्यक्तिगत सूचना वाले कॉलम में लिखें। रेज्युमे में ऎसी आईडी न दें जो देखने में अजीब लगे। आईडी बिल्कुल सादा होनी चाहिए।
अड्रेस: पत्राचार हेतु पता
टॉप राइट साइड में हमेशा पत्राचार करने हेतु वाला पता दिया जाना चाहिए। इससे रिक्रूटर को पत्राचार करने में सुविधा होती है। उसे इसे रेज्यूमे में तलाशना नहीं पढ़ता है।
ऑब्जेक्टिव: साफ और स्पष्ट
ऑब्जेक्टिव हमेशा छोटा, सादा और सीधा हो। साफ और कम शब्दों में यह बताएं कि आप कंपनी के लिए कैसे फायदेमंद हो सकते हैं। इसके लिए अपनी स्किल्स का हवाला दे सकते हैं।
शैक्षिक योग्यता: टू द प्वाइंट
योग्यता बताते वक्त रिवर्स कोनोलॉजी
का इस्तेमाल करे। लेटेस्ट `ॉलिफिकेशन सबसे पहले लिखें और फिर नीचे की तरफ बढ़ते जाएं।इसका उल्लेख करते समय यह ध्यान रखें कि आप किसी पोस्ट के एप्लाय कर रहे हैं।
अनुभव: संक्षिप्त और क्रमानुसार
कुल अनुभव वर्षो में बता सकते हैं। अनुभव के बारे में बताते हुए जिस कंपनी में अभी काम कर रहे हैं, वह सबसे ऊपर, उसके बाद उससे पहले के अनुभवों का जिक्र करें। इसके अलावा निभाए गए अहम प्रॉजेक्ट्स का जिक्र कर सकते हैं।
व्यक्तिगत सूचनाएं:
रेज्युमे के सबसे अंत में आप अपने पिता और माता का नाम, डेट ऑफ बर्थ, मैरिटल स्टेटस भी देना चाहिए। डेट ऑफ बर्थ बताते वक्त साथ में यह भी लिख दें कि वर्तमान में आप कितने वर्ष के हैं।
सिर्फ बर्थ ईयर से आपकी उम्र पता करने में कैलकुलेशन करनी होगी, जिसके लिए एम्प्लॉयर के पास वक्त नहीं होता। इसी तरह मैरिटल स्टेटस की जानकारी भी देनी चाहिए। इसके अलावा अपनी रूचियों का विवरण भी देना चाहिए।परमानेंट अड्रेस भी देना चाहिए।
इनका ध्यान रखे हर दम
1. फॉन्ट का प्रयोग
याद रखें कि पूरे रेज्युमे में ज्यादा से ज्यादा दो फॉन्ट का ही प्रयोग करना चाहिए। फॉन्ट साइज आसानी से पढ़ने में आना चाहिए। इसे 10 रख सकते हैं।
2. बोल्ड ,अंडरलाइन, इटैलिक
शब्दों को बोल्ड, अंडरलाइन या इटैलिक जरूरत से ज्यादा न करें। वाक्यों के बीच गैप भी ठीकठाक हो। याद रखिए एम्प्लॉयर को अगर उन्हें पढ़ने में दिक्कत हुई तो उन्हें आगे बढ़ते देर नहीं लगती।
3. आकार
रेज्यूमे का आकार इंडस्ट्री और अनुभव पर निर्भर करता है। दो पेज से बडे रेज्यूमे बनाने से बचना चाहिए।
4. सीधी सपाट हो भाषा
पूरे रेज्युमे की भाषा सीधी और सपाट रखें। तथ्यों को गोलमोल घुमाकर न रखें।
5. ज्यादा मैं,मैं नहीं
आई, माई, मी जैसे शब्दों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें। अपने बारे में ज्यादा बखान करने का रिक्रूटर पर बैड इंप्रेशन पड़ता है।
6. रेफरेंस कहने पर ही दें
रेफरेंस का जिक्र तब तक न करें, जब तक निर्देश न दिए गए हो। ऎसे लोगों को तैयार जरूर रखें, जो आपको अच्छी तरह जानते हों। मांगने पर उनका जिक्र करें ,साथ उनका संपर्क नबंर भी दें।
7. ग्रामर व स्पेलिंग गलत न हो
स्पेलिंग पूरी लिखें। प्रूफ रीडिंग जरूर करा लें। पंच्चुएशन का खास ध्यान रखें। ग्रामर के मामले में बहुत सावधान रहने की जरूरत है।
8. फोटो न लगाएं
फोटो न लगाएं क्योंकि जिस साइज में आप फोटो पेस्ट करेंगे, वह न तो क्वालिटी में अच्छा आएगा और न देखने में। जाहिर है इसका अच्छा इंप्रेशन भी नहीं पड़ेगा।