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Friday, April 30, 2010

सत्ता के बाजार में नीलाम होता सच

महेंद्र तिवारी
संसद में पिछले दिनों पेश आए तीन वाकयों ने नाउम्मीदी, नफरत और नाराजगी की कड़वी यादों को फिर हरा कर दिया, जब देश के सबसे बड़े सत्ता बाजार में सच की सरेआम नीलामी की गई। ऐसा एक नहीं, बल्कि अलग-अलग सूरतों में तीन बार हुआ। वैसे 'राज' की खातिर 'नीति' से बलात्कार पहले भी हुआ है, लेकिन अब इसकी पुनरावृत्ति कुछ ज्यादा ही होने लगी है।
बहरहाल, ऊपर उल्लेखित तीनों वाकये वास्तव में संप्रग के बैनर तले बनी 'मतलबपरस्ती' की ऐसी सियासी पटकथा है, जिसे बसपा, राजद और सपा तीनों ने एक साथ संसद के परदे पर उतारा। कटौती प्रस्ताव को लेकर अदा किए गए लालू-मुलायम और माया के किरदार तो हिंदी फिल्म के 'खलनायकों' को भी चुनौती दे रहे थे। इन्हें देख लगने लगा कि वैज्ञानिक कहीं इस बात पर शोध शुरू न कर दें कि 'थाली के बैंगन' और नेताओं के डीएनए में कहीं कोई जुड़ाव तो नहीं है?
गौरतलब है कि भाजपा और वामदलों ने 27 अप्रैल को संसद में पेट्रोल-डीजल की मूल्यवृद्धि को लेकर सरकार के खिलाफ कटौती प्रस्ताव लाने की घोषणा की थी। वामपंथियों ने 13 गैरयूपीए दलों जेडीएस, भाकपा, आरएसपी, सपा, राजद, बीजद, अन्ना द्रमुक, तेलुगूदेशम, नेलोद और फारवर्ड ब्लॉक आदि को लामबंद किया, वहीं भाजपा शिवसेना, जदयू और अकाली दल सरीखे राजग के घटक दलों को एक जाजम पर लाने की कवायद में जुट गई।
सरकार में शामिल डीएमके और तृणमूल कांग्रेस भी बजट में बढ़ाए गए दामों को वापस लेने की माँग कर चुके थे, लेकिन चूँकि वे सत्ता का हिस्सा थे इसलिए उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा।
वामपंथी यह समझ रहे थे कि राजद और सपा 'भारत बंद' की तरह कटौती प्रस्ताव में भी उनके साथ खड़े रहेंगे। भाजपा ने तो इन दोनों से उम्मीद नहीं रखी थी, लेकिन उसे इतना यकीन था कि लालू-मुलायम महँगाई जैसे जनहित के मुद्दे पर पीठ नहीं दिखाएँगे।
जैसे-जैसे दिन चढ़ा, चाल, चेहरा और चरित्र सभी साफ होने लगे, लेकिन सुषमा स्वराज (लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष) और वामपंथियों को क्या पता था कि जिस विपक्ष की एकजुटता का वे दम भर रहे हैं, वह ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। जिन नेताओं को साथ लेकर वे सरकार को झुकाने की कोशिश कर रहे हैं, असल में खुदगर्जी के पैरोकार हैं। उनका पहला फर्ज सीबीआई के शिकंजे से अपनी गर्दन छुड़ाना है न कि महँगाई के बोझ तले तिल-तिल मरने वाली जनता के हक की आवाज बुलंद करना।
याद रहे कि लालू-मुलायम और मायावती तीनों के खिलाफ सीबीआई (विपक्ष के शब्दों में-कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन) आय से अधिक संपत्ति के मामलों की जाँच कर रही है।
कांग्रेस और उक्त नेताओं के बीच सौदे का आधार कथित रूप से 'सीबीआई जाँच' ही थी। लालू-मुलायम का 'भारत बंद' में शामिल होना भी इसी सौदे का का हिस्सा था। मायावती का कदम आखिरी समय में सरकार को जिताने के लिए उठेगा, यह भी कांग्रेस जानती थी। इसके संकेत खुद सरकार के रणनीतिकारों ने मीडिया को दिए थे।
सवाल यह है कि जब तीनों नेताओं ने सरकार से साठगाँठ कर ही रखी थी तो महँगाई के मोर्च पर जनता का हमदर्द बनने का झूठा नाटक क्यों खेला गया? क्यों मायावती ने अपने पत्ते खोलने से पहले मीडिया को इकट्ठा कर चुन-चुन कर कांग्रेस पर तोहमत के तीर छोड़े? क्यों यह कहा कि मूल्यवृद्धि कम करने में मनमोहनसिंह नाकाम रहे हैं?
जब मायावती को कांग्रेसनीत यूपीए सरकार से किसी अच्छे भविष्य की उम्मीद ही नहीं थी (ऐसा अपनी प्रेस कांफ्रेंस में मायावती ने कहा था) तो उसे समर्थन क्यों दिया? राहुल के दलित प्रेम को नौटंकी कहने वाली मायावती ने उन्हीं के कुनबे को सहारा देने वाला 'आधार' बनना कैसे मंजूर कर लिया?
मायावती का तर्क है कि यूपीए को समर्थन उन्होंने इसलिए दिया, क्योंकि वे सांप्रदायिक ताकतों (भाजपा) को सत्ता में आने नहीं देना चाहती थीं। मायावती से यह पूछा जाना चाहिए कि उप्र में इन्हीं सांप्रदायिक दलों के साथ सत्ता का सुख भोगते वक्त उन्हें यह खयाल क्यों नहीं आया? मनुवादी मानसिकता वाली पार्टी के समर्थन से सीएम बनना उन्हें नागवार क्यों नहीं गुजरा?
लालू और मुलायम ने भी यूपीए का संकटमोचक बनने के पीछे सांप्रदायिक ताकतों की आड़ ली। दोनों का कहना है अगर हम सरकार का साथ नहीं देते तो जनता को क्या मुँह दिखाते? यादव द्वय का तो नागरिक अभिनंदन होना चाहिए।
राम और रहीम एक हैं...यह इन्हीं नेताओं ने आवाम को समझाया है। अगर ये नहीं होते तो भारतवर्ष में सामाजिक समरसता कभी रह ही नहीं पाती। धर्मनिरपेक्षता का वजूद इनसे शुरू होकर इन्हीं पर खत्म होता है।
भाजपा को सांप्रदायिक करार देने वाले वे मुलायमसिंह यादव ही थे, जिन्होंने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी की शान में एक से बढ़कर एक कसीदे पढ़े थे। उस वक्त सपा अध्यक्ष को आडवाणी में देश का नेतृत्व करने के सारे गुण दिखाई दिए थे। फिर किस मुँह से मुलायम ने भाजपा को सांप्रदायिक कहा, इस बात का जवाब उन्हें देना चाहिए।
जिस कटौती प्रस्ताव की मुखालफत कर बसपा, राजद और सपा सरकार की गोद में जा बैठे, उन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि अगर वे इस पर विपक्ष का साथ देते तो जनता की नजरों में इनकी इज्जत में इजाफा ही होता। अपने-अपने सूबों (उप्र, बिहार) से बुरी तरह हकाल दिए गए लालू-मुलायम के पास तो राष्ट्रीय स्तर पर जनता का समर्थन हासिल करने का मौका था।
मायावती भी उप्र में अभी तक कोई बहुत अच्छा शासन नहीं दे पाईं हैं। ऐसे में अगर वे भी कटौती प्रस्ताव का समर्थन कर लेतीं तो कीमतों की कटार से छलनी आम आदमी का अंतस उन्हें दुआएँ ही देता। वैसे भी तीनों ही दल सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। इसका मतलब उसके प्रति इनकी नैतिक प्रतिबद्धता भी नहीं है।
हालाँकि यह सही है कि अगर तीनों ही पार्टियाँ सरकार के खिलाफ वोट करतीं तो संप्रग सरकार के लिए संवैधानिक संकट खड़ा हो जाता। सरकार समर्थकों की संख्या बहुमत से थोड़ी ही ज्यादा रह जाती। सरकार तो नहीं गिरती, लेकिन मनमोहन मंत्रिमंडल की किरकिरी जरूर हो जाती। हो सकता है नैतिक रूप से जिम्मेदारी स्वीकार कर वे इस्तीफा भी दे देते, लेकिन इसकी चिंता तीनों दलों को महँगाई पर सरकार का विरोध करने से पहले करना चाहिए थी।
यह तो कोई नैतिकता नहीं हुई कि जिस मुद्दे पर आप सत्तारूढ़ गठबंधन का विरोध करते हैं, उसी मसले पर विपक्ष द्वारा सरकार को घेरने की बारी आने पर भाग खड़े हों। इससे बेहतर था आप सरकार में ही शामिल हो जाते। तब न सरकार की झूठी बुराई करना पड़ती और न ही सीबीआई जाँच का डर रहता। उस वक्त तो 'पाँचों अँगुलियाँ घी में और सिर कड़ाही में' वाले मजे होते।
उल्लेखनीय यह भी है कि वामदल और भाजपा ने साफ कर दिया था कि उनकी मंशा सरकार गिराने की नहीं है। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि सरकार को सहारा देना जरूरी हो गया?
मान लिया कि सरकार गिर भी जाती तो केवल इन्हीं तीन नेताओं को मध्यावधि चुनाव का जिम्मेदार माना जाता, ऐसी बात नहीं है। अभी तक जितने भी चुनाव हुए हैं, सारा पैसा जनता की जेब से ही गया है। अतीत में पहले भी मतलब की राजनीति होती रही है और मध्यावधि चुनाव का संत्रास भोगने पर आम आदमी मजबूर होता रहा है। ऐसे में तीनों नेता यह दलील भी नहीं दे सकते कि देश पर चुनाव का बोझ न पड़े, इसलिए हमने यह 'कुर्बानी' दी है।
भाजपा भी कम खुदा नहीं : स्वार्थ के समुंदर की एक धारा भाजपा से होकर भी गुजरती है। आईपीएल विवाद पर विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर का इस्तीफा माँगने वाली भगवा पार्टी प्रफुल्ल पटेल और शरद पवार का नाम आने पर उतनी आक्रामक नहीं दिखी। हंगामे के साथ संयुक्त संसदीय समिति की माँग जरूर भाजपा ने की, लेकिन दोनों ही नेताओं से नैतिक रूप से कुर्सी छोड़ने को उसने नहीं कहा। यहाँ आकर भाजपा भी मतलबपरस्ती के उसी दलदल में धँस गई, जिसका कीचड़ लालू-मुलायम और मायावती के दामन पर लगा।
गौरतलब है कि राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली बीसीसीआई की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य हैं। संसद से बाहर उनकी शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल दोनों से अच्छी दोस्ती है। सूत्रों के मुताबिक जेटली के कहने पर ही पार्टी ने दोनों मंत्रियों के खिलाफ अपने सुर में नरमी दिखाई।
जाहिर है दोनों मंत्रियों के इस्तीफा देने का परिणाम देर-सवेर जेटली को ही भुगतना पड़ता। यही वजह थी कि जेटली की ना-नुकूर के बाद भाजपा संसद में आईपीएल विवाद को लेकर सरकार पर चिल्लाती तो रही, लेकिन इन दोनों के इस्तीफे माँगने की गलती उसने नहीं की।
भाजपा की संसदीय दल की बैठक में खुद मेनका गाँधी ने इस मुद्दे पर पार्टी नेताओं को आड़े हाथों लिया था। उनका कहना था कि मुंबई हमले के वक्त एनएसजी के जवानों को दिल्ली से मुंबई पहुँचने में घंटों लग जाते हैं, लेकिन आईपीएल खिलाड़ियों को पूर्णा पटेल के कहने पर एयर इंडिया का विमान एक घंटे में यहाँ से वहाँ ले जाता है। इसका मतलब यह कि भाजपा ने भी विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका को सौ फीसदी नहीं जिया।
सो गया सोरेन का जमीर : झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने भी उसी 'सीबीआई शूल' से जान छुड़ाने के लिए संसद में यूपीए का झंडा उठा लिया। गुरुजी ने कांग्रेस के हक में फैसला लेने में जरा भी देर नहीं की। (सोरेन ने भी कटौती प्रस्ताव पर यूपीए के पक्ष में वोट डाला था) उन्होंने भी नहीं सोचा कि झारखंड में जिस भाजपा के रहमोकरम से वे सीएम की कुर्सी की शोभा बढ़ा रहे हैं, उससे कैसे नजरें मिलाएँगे। हालाँकि सोरेन से नैतिकता की आस रखना अपने आप को धोखा देने के बराबर है, लिहाजा उनके लिए ज्यादा न लिखना ही मुनासिब रहेगा।
उक्त तमाम घटनाक्रम के बाद तो यही दिल से निकलता है कि-
नेता की खाल में सत्ता का दलाल नजर आता है
हकीकत के उजाले में हर चेहरा झूठ की ढाल नजर आता है

Tuesday, April 27, 2010

भारत क्यों नहीं है विश्वशक्ति?

-वाईसी हालन
अपनी पुस्तक 'इंडिया, इमर्जिंग पावर' में दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ स्टीफन पी. कोहेन भारत के महाशक्ति बनने के संदर्भ में लिखते हैं कि सैन्य शक्ति समेत हर तरह की शक्ति आर्थिक मजबूती से ही हासिल होती है।
विश्व के इतिहास का विश्लेषण करें तो यह बात सही भी है। दूसरे विश्वयुद्ध से पहले तक ब्रिटेन एक बड़ी महाशक्ति रहा है, क्योंकि इसने औद्योगिक क्रांति के दौरान ही अपने उद्योगों को विकसित कर लिया था। अपना विकास करने के लिए इसने दुनिया के एक-चौथाई देशों को कब्जे में किया और दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित किया।
अमेरिका ने भी 1776 में ब्रिटिश शासकों को निकाल भगाने के बाद अपना ध्यान मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने पर केंद्रित किया। बीसवीं सदी के प्रारंभ तक यह एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुका था। पहले विश्वयुद्ध ने इसे सैन्यशक्ति तैयार करने का मौका दिया और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह दुनिया की सबसे मजबूत सैन्य व आर्थिक शक्ति बना।
अमेरिका के साथ ही सोवियत संघ ने भी महाशक्ति का दर्जा हासिल कर लिया था, क्योंकि यह विश्व राजनीति को प्रभावित करने में सक्षम हो गया था। लेकिन 90 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद वह एक महाशक्ति नहीं रह गया। वह दर्जा उसने इसलिए खो दिया था कि उसने अपनी आर्थिक शक्ति की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया था।
उसने सिर्फ सैन्य शक्ति बढ़ाने की असंतुलित नीति लागू की। अस्सी के दशक तक तो इस रणनीति ने काम किया, लेकिन उसके बाद यह नीति असफल हो गई और नतीजे में सोवियत व्यवस्था विखंडित हो गई।
1980 के दशक में सोवियत अर्थव्यवस्था इस हद तक पतित हो चुकी थी कि वह सोवियत सैन्य तंत्र को ही नहीं संभाल पा रही थी। तब से अमेरिका अपनी सारी कमजोरियों और समस्याओं के बावजूद दुनिया की अकेली महाशक्ति बना हुआ है। इसके पास एक बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति है, एक विस्तृत सैन्य शक्ति है और दुनिया के देशों पर उसका जबर्दस्त राजनीतिक प्रभाव है।
आर्थिक शक्ति सबसे ज्यादा जरूरी है ताकि यह अपने आर्थिक साधनों से दूसरे देशों को प्रभावित कर सके। आर्थिक शक्ति हासिल करने के लिए उसका औद्योगिक आधार विस्तृत और मजबूत होना जरूरी है।
साथ ही बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन होने चाहिए, बड़ी पूँजी होना चाहिए ताकि दूसरे देशों में भी उसका निवेश किया जा सके, उसके पास अधुनातन प्रौद्योगिकी हो, भौगोलिक रूप से सही रणनीतिक जगहों पर उसकी पहुँच हो और उसके पास स्वास्थ्य व शिक्षा की एक विकसित प्रणाली हो।
सोवियत संघ के पतन के बाद जो दो देश इस जगह को भर सकते थे, वे थे भारत और चीन। भारत, चीन से बेहतर स्थिति में था क्योंकि उस समय भारत की अर्थव्यवस्था चीन से आगे थी लेकिन भारत राजनीति के बियाबान में भटक गया, हालाँकि इसकी अर्थव्यवस्था ने जल्द ही गति पकड़ ली लेकिन समग्र आर्थिक विकास में चीन आगे निकल गया।
उत्तर और पूर्व में उग्रवाद पर काबू पाने में राज्य और केंद्र की सरकारों का ध्यान ज्यादा रहा। और वे आतंकवाद और आर्थिक मोर्चे पर भी गैरजिम्मेदाराना रुख दिखाती रहीं।
इसके विपरीत चीन ने अपना पूरा ध्यान आर्थिक विकास पर लगाया और सैन्य शक्ति को बढ़ाया। आर्थिक विकास को लेकर उसका एजेंडा बहुत साफ रहा है। उसने सस्ते उत्पादों के जरिए दुनिया के बाजारों में प्रवेश किया और देश के हित के लिए विदेशी पूँजी आने के लिए अपने रास्ते खोल दिए। एक मजबूत ढाँचा खड़ा करने में वह सफल रहा।
इस प्रक्रिया में उसने विदेशी मुद्रा और खासकर अमेरिकी डॉलर का इतना बड़ा भंडार खड़ा कर लिया कि वह अमेरिकी सिक्योरिटीज में निवेश करने लगा और अमेरिका को कर्ज देने वालों में वह सबसे आगे हो गया।
भारत के पास भी वे सुविधाएँ थीं, जो चीन के पास थीं-एक बड़ी और बढ़ती युवा जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन की प्रचुरता और बहुत बड़ी संख्या में विदेशी उद्यमी भी यहाँ निवेश करने में दिलचस्पी ले रहे थे। लेकिन महाशक्ति बनने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जरूरतों को भारत पूरा नहीं कर सका। एक मजबूत ढाँचा बनाने में वह नाकाम रहा।
औद्योगिक और कृषि के विकास के लिए जरूरी सड़कें, रेल सुविधाएँ, विमान सेवाएँ और जहाजरानी, ऊर्जा, पानी आदि पर्याप्त नहीं रहे। बिजली की भारी कमी के कारण उद्योग महीने में कई-कई दिन के लिए बंद रहने लगे जिससे उत्पादन में बहुत कमी आई। भारत अपने को विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में नाकाम रहा।
भारत का बुनियादी ढाँचा (बिजली, सड़कें, बंदरगाह और हवाई अड्डे) हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हैं। इसकी वजह से हमारा औद्योगिक और कृषि विकास रुक गया। प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों के कारण ऐसे उत्पादों के निर्यात में जिनमें ज्यादा श्रमशक्ति की जरूरत होती है, वह चीन के मुकाबले पिछड़ गया। अफसरशाही अपनी औपचारिक सीमाओं में बँधी होने के कारण आगे नहीं देख पा रही थी।
इससे उद्योगों और ढाँचागत निवेश प्रभावित हुआ और विकास में बाधा आई। कृषि क्षेत्र के प्रति उदासीनता बरतने से इसमें निवेश वास्तव में नकारात्मक हो गया। आज भी भारत की कृषि मानसून पर निर्भर है। और यह कृषि के मामले में साठ साल पीछे की हालत में है।
अगर भारत महाशक्ति बनना चाहता है तो इसे आर्थिक रूप से ताकतवर बनना होगा। तभी यह अपने को सैन्य शक्ति या सामरिक रूप से प्रभावकारी बना सकता है। तभी यह अपने निकट के और दूर के क्षेत्रों में अपना प्रभाव पैदा करने में सक्षम होगा।
नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे अपने कमजोर पड़ोसियों को प्रभावित करने में भी भारत असफल रहा है। आज सारी दुनिया में कहा जा रहा है कि अगली महाशक्ति भारत नहीं, चीन है। चीन तरक्की की राह पर है। पिछले आठ सालों में विश्व के आर्थिक उत्पादन में चीन का हिस्सा 3.4 प्रतिशत से बढ़कर 8 प्रतिशत हो गया है।
आज पूरी दुनिया को यकीन है कि आने वाले 20 सालों में चीन अगली महाशक्ति होगा। महाशक्ति बनने के सभी लक्षण वह देश दिखा रहा है। 2003 में चीन ने दुनिया का 70 प्रतिशत तेल, चौथाई इस्पात और अल्युमीनियम, विश्व के संपूर्ण लौह अयस्क और कोयले का एक तिहाई हिस्सा और सीमेंट का 40 प्रतिशत भाग खरीदा औऱ अपने को विश्व का अग्रणी देश साबित किया।

Monday, April 26, 2010

दर्दनाशक 'दवा' से खत्म होते गिद्ध

संदीपसिंह सिसोदिया
प्रकृति ने हर प्राणी को एक नियम के तहत बनाया है, हर प्राणी को एक जिम्मेदारी दी गई है। प्रकृति के इस चक्र में साफ-सफाई का काम करने वाले गिद्धों की संख्या पिछले एक दशकों में एकाएक घट गई है।
लगभग सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के लिए भारत में सरकार ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसके तहत पशुओं को दी जाने वाली उस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसके कारण गिद्धों की मौत हो रही थी। पक्षी संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 14 सालों में गिद्धों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से 97 प्रतिशत की कमी आई है और वे विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गए हैं।
इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है कि पशुओं को दर्दनाशक के रूप में एक दवा डायक्लोफेनाक दी जाती है और इस दवाई को खाने के बाद यदि किसी पशु की मौत हो जाती है तो उसका माँस खाने से गिद्ध मर जाते हैं।
भारत, पाकिस्तान और नेपाल में हुए सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के शरीर में डायक्लोफेनाक के अवशेष मिले हैं। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इस दवा के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो उनका माँस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुँचता है, जिससे वे मौत का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से भारत में गिद्धों की संख्या तेजी से कम हो रही है।
साथ ही शहरी क्षेत्रों में बढ़ता प्रदूषण, कटते वृक्षों से गिद्धों के बसेरे की समस्या भी इस शानदार पक्षी को बड़ी तेजी से विलुप्ती की ओर धकेल रही है। वैसे भी भारतीय समाज में गिद्धों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, मरे हुए प्राणियों का माँस नोचने वाले इस पक्षी को सम्मान या दया की दृष्टि से नहीं देखा जाता है।
मुर्दाखोर होने की वजह से गिद्ध पर्यावरण को साफ-सुथरा रखते हैं और सड़े हुए माँस से होने वाली कई बिमारियों की रोकथाम में सहायता कर संतुलन बैठाते हैं।
ब्रिटेन के रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स में अंतरराष्ट्रीय शोध विभाग के प्रमुख डेबी पेन का कहना है कि गिद्धों की तीन शिकारी प्रजातियाँ चिंताजनक रूप से कम हुई हैं।
उनका कहना है हालाँकि अब भारत में डायक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन भोजन चक्र से इसका असर खत्म होने में काफी वक्त लगेगा।
गौरतलब है की टनों की संख्या में यह दवा गाँव-शहरों में उपलब्ध है। निरक्षरता और इस सम्बन्ध में कोई समुचित जानकारी नहीं होने से इस पर लगाए गए प्रतिबंध इतनी जल्दी असरदार साबित होंगे इसमें संदेह है।
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 2008 की समीक्षा के अंतर्गत भी ऐसी दवाइयों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई है, जिनसे किसी वन्य प्रजाति को नुकसान हो।
रेगिस्तानी इलाकों के मुख्यतया पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या सिर्फ गुजरात में ही 2500 से घटकर 1400 रह गई है। कभी राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब बिरले ही कहीं दिखाई देते हों। गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में गिरावट आई है।
इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं।।
भारत में कभी गिद्धों की नौ प्रजातियाँ पायी जाती थीं। ये हैं बियर्डेड, इजिप्शयन, स्बैंडर बिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लोंगबिल्ड, हिमालियन ग्रिफिम एवं व्हाइट बैक्ड। इनमें से चार प्रवासी किस्म की हैं।
पर्यावरण में गिद्धों की भूमिका : पर्यावरण के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका है। देखा जाए तो सदियों से ये गिद्ध ही मरे हुए जानवरों के अवशेषों को खा कर देखा जाए तो धरती पर पड़ी गंदगी को खत्म करते रहे हैं। इससे कई बिमारियाँ व संक्रमण की रोकथाम होती है। प्राकृतिक रूप से भोजन चक्र में गिद्धों की भूमिका अहम रही है। खाद्य श्रृंखला में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
संरक्षण के लिए उठाए गए कदम : पशुओं के इलाज के दौरान उन्हें दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लोफेनिक ही गिद्धों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, यह बात आज से करीब दो दशक पहले ही उजागर हो गई थी। डायक्लोफेनिक से गिद्धों की मौत होने की जानकारी करीब 20 साल पहले ही मिल गई थी, लेकिन तब से लेकर आज तक गिद्धों में दवा के असर को कम करने का कोई तरीका ढूँढ़ा नहीं जा सका है।
भारत सरकार भी इस संबध में हुए सर्वेक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद मान गई कि इस दवाई के कारण ही गिद्धों की मौत हो रही है| नतीजतन भारत सरकार से संबद्ध नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ ने डायक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी, जिसे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने स्वीकार कर डायक्लोफेनाक की जगह दूसरी दवाइयों के उपयोग को मंजूरी दे दी।
गाँवों और दूर-दराज के क्षेत्रों में यह दवा जानवरों के लिए अभी भी धड़ल्ले से उपयोग में लाई जा रही है, जिससे गिद्धों को हाल में तो कोई राहत मिलती नहीं दिखती।

Thursday, April 22, 2010

क्या भारत देश को फिर गुलाम होने का डर?

भारत देश, खुशहाल देश, मनमोहक देश यदि ऐसे देश को फिर से गुलामी जंजीरों में कोई जकड़ लेता है तो क्या ये ऐसा कहने लायक रहेगा। शायद नहीं? भारत देश को आज के समय में अपने ही पड़ौसी देशों से खतरा महसूर हो रहा है क्योंकि एक ओर पाकिस्तान तो दूसरी ओर चीन।
पाकिस्तान जोकि भारत से निकाला हुआ ही एक अंग है जो कहता है कि कश्मीर हमारा है। इसलिए वह तीन बार भारत पर हमला कर चुका है और हमेशा उसे मुहं की खाने की आदत पड़ चुकी है। वह भारत को कट्टर शत्रु मानता है। वह पिछले काफी समय से हमला क्यों नहीं कर रहा है? क्या वह अमेरिका से डरता है शायद नहीं भी और शायद डरता भी हो। तो दूसरी ओर बसे चीन देश का क्या जोकि किसी से डरता भी नहीं है और जहां चाहे वहां कुछ भी कर बैठता है। पाकिस्तान पर तो अमेरिका ने नकेल शायद लगा ही रखी है, लेकिन अमेरिका ने चीन पर नकेल क्यों नहीं कसी। वह सरेआम परमाणु हथियार बनाता है और सप्लाई भी करता है। वो भी किसे शायद पाकिस्तान को ही? यदि ऐसा है तो अमेरिका तो क्या कोई भी भारत को गुलाम होने से नहीं रोक सकता है।
सुनने में आया है कि हिमालय पर्वत की श्रेणियों में जो माउंट ऐवरेस्ट नामक सर्वोच्च ऊंची चोटी है वहां करीब २०० किलोमीटर दूसरी पर एक लड़ाकू एयरपोर्ट स्थापित करने जा रहा है। यदि उसका इरादा भारत से जंग छेडऩे का है तो शायद भारत को इस बारे में कुछ भी सोचने का वह मौका ही क्यों देगा। सीधे हवाई हमलों से ही शुरूआत होगी। इस बात का फायदा शायद पाकिस्तान भी उठाएगा एक ओर तो पाक तो दूसरी ओर चीन दोनों मिलकर भारत को कहीं आधा-आधा न बांट लें इसके लिए सरकार ने क्या सोचा है? शायद कुछ भी नहीं? क्यों सरकार इस वक्त बीजी है वो भी अपने भारत देश में ही पैदा हुए आतंकवादियों से निपटने को।
यदि भारत सरकार देश में ही सुदृढ़ नहीं है तो बाहर वाले तो इसका फायदा उठाने में देरी नहीं करेंगे। यदि कई दिनों से भूखे, प्यारे को रोटी और पानी मिल रहा हो वो भी सामने जिसे रोकने वाला कोई भी ना हो तो वह क्या करेगा। सोचेगा नहीं सीधा खाने को ही दौड़ेगा। सरकार को इस विषय में गहनता से सौचना चाहिए और जिस देश का आशीर्वाद लगभग सभी देशों पर है उससे भी गहनता से विचार करना चाहिए।

देश पर मर मिटने वाले की संख्या यदि कम तो फिर...

भारत देश आज विकाशील देश है, लेकिन इस देश पर यदि कोई आंच आती है तो इस पर मर मिटने वाले युवाओं की संख्या आज कम क्यों होती जा रही है। क्या देश में भ्रष्टाचार को बोलबाला पहले से कहीं अधिक हो गया है और युवाओं के दिलों में जो जज्बा देश में लिए होता है था शायद वो आज कम हो गया है। कम ही क्यों लगभग समाप्त हो चुका है। आज का युवा देश के लिए कम और अपने लिए अधिक सोचने लग गया है। यदि ऐसा है तो आने वाले समय में देश पर मर मिटने वालों की संख्या ही नहीं बचेगी और भारत देश फिर किसी इंग्लैंड का गुलाब होकर रह जाएगा। जब देश को आजाद कराने के लिए वो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू आदि जैसे नेता या फिर क्रांतिकारी नहीं पैदा होंगे तो शायद भारत देश का नक्शा ही कुछ ओर होगा।
इस विषय पर सरकार सोचे भी तो क्या सोचेगी कि देश से पहले भ्रष्टाचारियों को समाप्त किया जाए। या फिर देश के प्रति सोचा जाए? आज का युवा अपने लिए इसलिए सोचने लगा है इसका कारण स्वयं सरकार के सिवाय कोई ओर है ही नहीं। क्योंकि सरकार के नुमाईदों में ही वो चेहरे छूपे बैठे हैं जोकि भ्रष्टाचार को एक पीढ़ी की भांति फैला रहे हैं। मानों हर रोज एक नई पीढ़ी जन्म ले रही हो। देश पर मर मिटने वालों की संख्या इसलिए ही शायद कम हो चुकी है। यदि कोई आम देशभक्त अपने दिल में देश के लिए मर मिटने का जज्बा लेकर भर्ती में जाता है तो उसे दूसरों को खिलाने के लिए घुस नहीं होती चाहे वह हर क्षेत्र में अव्वल रहा हो, लेकिन घुस की प्यास को बुझाने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं होगा तो उसे किसी न किसी कारण का थप्पा लगाकर निकाल दिया जाएगा।
मेरा यह मानना है कि जिस प्रकार सरकार महंगाई को आज तक नहीं रोक पाई हो यदि उसी की तर्ज पर महंगाई के स्थान पर देशभक्ति को जोड़ दिया जाएगा तो क्या होगा? क्या इस देश का नक्शा आज कुछ और नहीं होता या फिर कुछ और? आज के समय में मां देश भक्तों को पैदा तो करती हैं, लेकिन यदि वह गरीब, पिछड़ा वर्ग होता है तो उसके पास पैसे कहां से आएंगे। वह भूखा तो मरेगा नहीं इसलिए चोरी करेगा, डाका डालेगा और किसी न किसी तरह से अपना पेट पालेगा। क्या यही है इस विकाशील देश का भविष्य? यदि यही है इस विकाशील देश का भविष्य तो दिक्कार है ऐसे देश की सरकार और सिस्टम पर। फिर तो यह देश मात्र विकाशील नाम से विकाशील ही रहेगा कभी शायद विकासित ही नहीं हो पाएगा?
सरकार हर विषय पर बैठकें आयोजित करती है, पैसों को पानी की तरह से बहाती है, हर विषय में कड़े तेवर अपनाए जाते हैं, लेकिन इस भारत देश की सुरक्षा के बारे में शायद कुछ नाम मात्र भी नहीं सोचा जाता है। यदि कोई देश अपने देश में कुछ आतंवादियों को भेजकर हमला करवा देता है तो यहां सिस्टम के अनुसार भारत देश के रक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है और दूसरे रक्षा मंत्री को नियुक्त कर दिया जाता है। यदि दूसरे रक्षा मंत्री के होते हुए ऐसा होता है तो फिर तीसरा, चौथा फिर....यह सब शायद पहले से ही चलता आ रहा है।
दूसरी ओर भारत में फौज, कमांडो, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, आईबी देश के लिए रक्षक के नाम पर काम करते हैं। इसमें अत्यधिक भारत में फौज को त्वजो दी जाती है ऐसा क्यों? क्यों कमांडो, पुलिस, सीबीआई, सीआईडी, आईबी देश के लिए रक्षक केवल नाम मात्र ही हैं ऐसा भी क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि आज सीबीआई जिसे केस सुलझाने के लिए सर्वोच्च नाम से पूकारा जाता है कि केस का फैंसला सीबीआई को सौंप दो। एक बात मेरी समझा में आज तक नहीं आई जब सीबीआई भी भ्रष्टाचारियों से भरी हो या फिर बड़े-बड़े नेताओं के चलते हुए केस की छानबीन में यदि दस वर्ष भी लग जाते हैं तो इस देश में उस केस को १० साल तक याद रखने वाला कोई नहीं रहता। क्या सरकार को फौज, कमांडो की भर्ती के लिए अलग से स्टाफ देना चाहिए यदि ऐसा संभव नहीं है तो देश को आतंवादियों की जानकारी, देश में घुसकर हमला करने के बारे में पहले जानकारी, मौके पर फैसला करने का हक देने के लिए एक अलग से किसी फार्स का नाम रखकर उसमें देश के युवाओं को बकायदा कमांडो की टे्रनिंग देकर भर्ती करना चाहिए जिसमें भ्रष्टाचार का नामों निशान तक ना हो। जिसके नाम से कटिले तेवर दिखाने वाले विदेशी देश, देश में रहने वाले भ्रष्टाचारी भी थर..थर.. कांपने लगा जाएं।