Pages

Thursday, August 19, 2010

अमिर खान, लेह में स्कूल के बच्चों के साथ जहां रैंचों बने


"All is not well". This was how a concerned Aamir Khan reacted on seeing the condition of The Druk White Lotus School where the Bollywood star shot for his super hit 3 Idiots, tweaking the film's popular punch dialogue "All is well" to reflect the ground situation.

आजादी पर कलंक : खाप परंपरा


स्मृति जोशी
इज्जत के नाम पर हत्या?
आजादी। एक शब्द जो हमें अहसास दिलाता है हम पर किसी और का नहीं बल्कि हम पर हमारा ही शासन है। लेकिन क्या सचमुच??? क्या सच में आजादी की लंबी डगर से चलकर हम उस अवस्था तक आ गए हैं जहाँ वास्तव में प्रगतिशील कहला सकें? बात 1947 से पूर्व की नहीं, बात 1947 के बाद के धीरे-धीरे बदलते भारत की भी नहीं है। बा‍त है सन 2010 की। इसी बरस की। इसी बरस, जबकि साइना नेहवाल, तेजस्विनी जैसी देश की प्रखर बेटियों ने विश्व स्तर पर चमकीली सफलताएँ दर्ज की थी।
इसी बरस जबकि लोकसभा की स्पीकर महिला है, देश की राष्ट्रपति महिला है, सत्ता पक्ष की कमान संभालने वाली महिला है, विपक्ष‍ी दल की प्रमुख महिला है और तो और महिला मुख्यमंत्री भी बड़े प्रदेशों की बागडोर थामे हुए है। इसी बरस देश के कुछ हिस्सों में इज्जत, प्रतिष्ठा, सम्मान, रूतबा, संस्कार और परंपरा के नाम पर घर की ही बेटियों को कत्ल कर दिया गया।
मौत के घाट उतार दिया गया उस 'आज की नारी' को जिसका महज इतना ही अपराध था कि उसने अपनी पसंद का जीवनसाथी चुना। उसने प्यार करने से पहले सात गौत्र की जानकारी हासिल नहीं की जिनके अनुसार एक ही कुल-गौत्र में जन्म लेने के कारण उसका प्रेमी उसका प्रेमी नहीं बल्कि (परंपरानुसार) वह उसका भाई है। है ना सिर को लज्जा से जमीन में गाड़ देने वाली बात? मगर कहाँ दिखाई दी इतनी लज्जा?
हल्ला मचा, चैनलों पर बहस चली, नेताओं के शर्मनाक बयान आए, सब कुछ हुआ पर समाज का खौलता हुआ वह गुस्सा नहीं आया जिससे एक लावा बह निकलता। बह निकलता एक ऐसा आक्रोश, जिसके आगोश में समाज के सारे बुद्धिजीवी, पैनी पैठ के चिंतक और प्रखर नारियाँ आ पाती। इस विभत्सता को, इस हीन हरकत को मात्र एक क्षेत्र विशेष की समस्या निरूपित कर दिया गया।
क्या है खाप पंचायत :-
खाप एक ऐसी पंचायत का नाम है जो एक ही गोत्र में होने वाले विवाद का निपटारा करती हैं। राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उप्र में इस तरह की खाप अस्तित्व में हैं। खाप यानी किसी भी जाति के अलग-अलग गोत्र की अलग-अलग पंचायतें। खाप पंचायतों का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। इस समय देश भर में लगभग 465 खापें हैं। जिनमें हरियाणा में लगभग 68- 69 खाप और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में करीब 30-32 खाप अपने पुराने रूप में संचालित हैं।
सबसे पहले महाराजा हर्षवर्धन के काल (सन् 643) में खाप का वर्णन मिलता है। इसके अलावा जानकारी मिलती है कि 1528 में मुगल बादशाह बाबर ने सर्वखाप पंचायत के अस्तित्व को मान देते हुए सोरम गाँव के चौधरी को सम्मान स्वरूप एक रुपया और 125 रुपए पगड़ी के ‍लिए दिया था।
विभिन्न मतानुसार 1199 में पहली सर्वखाप पंचायत टीकरी मेरठ में हुई थी। 1248 में दूसरी खाप पंचायत नसीरूद्दीन शाह के विरूद्ध की गई थी। 1255 में भोकरहेडी में, 1266 में सोरम में, 1297 में शिकारपुर में, 1490 में बडौत में और इसके बाद 1517 में बावली में सबसे बड़ी पंचायत हुई। आरंभ में सर्वखाप पंचायतों का आयोजन विदेशी आक्रमण से निपटने के लिए होता रहा। जब भी आक्रमण हुए सर्वखाप ने उनके विरुद्ध राजा-रजवाड़ों की मदद की।
स्वतंत्रता के पश्चात सर्वखाप पंचायतों का स्वरूप बदला और एक सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत 8 मार्च 1950 को सोरम में आयोजित हुई। तीन दिन तक चली इस पंचायत में पूरे देश की सर्वखाप पंचायतों के मुखियाओं ने भाग लिया। इस पंचायत के बाद दूसरी सबसे बड़ी सर्वखाप पंचायत 19 अक्टूबर 1956 को सोरम में ही आयोजित हुई थी।
शक्ति का प्रदर्शन :- खाप पंचायतें विवादों के निपटारे तो करती ही थी लेकिन इनकी अपनी एक विशिष्ट परंपरा भी होती थी। पंचायतों के मुखिया जब इनमें शामिल होते तो किसी सामान्य सम्मेलन की तरह नह‍ीं बल्कि परंपरागत अस्त्र-शस्त्र और अखाड़ों के साथ। इन अखाड़ों में मुख्य रूप में कुरूक्षेत्र, गढ़मुक्तेश्वर, बदायु, मेरठ, मथुरा, दिल्ली, रोहतक, सिसौली, शुक्रताल आदि शामिल है। परंपरागत शस्त्रों में मुख्य रूप से कटारी, तीरकमान, ढाल, तलवार, फरसा, बरछी, बन्दूक और भाला आदि हुआ करते थे। बाजों में ढपली, ढोल, तासे, रणसिंघा, तुरही और शंख हुआ करते थे जिसमें रणसिंघा और तुरही आज भी पंचायत के समय बजाई जाती है।
पहले ऐसी नहीं थी खाप :- आरंभिक दौर में खापों ने अँग्रेज शासन के विरुद्ध बादशाहों की मदद की। बाहरी आक्रमण से पिटने में अपनी ताकत दिखाई लेकिन धीरे-धीरे यह कतिपय स्वार्थी और सामंती लोगों के हाथ में पड़ गई जिन्होंने व्यक्तिग‍त द्वेष के चलते फैसलों को अपने अनुसार बदलने का कुकृत्य किया। यही वजह रही कि विवादित फैसलों की लंबी श्रृंखला बढ़ती गई और खाप बद से बदनाम अधिक हो गई।
खाप के चंद शर्मनाक फैसले :-
वर्ष : 2004, स्थान : भवानीपुर गाँव मुरादाबाद उत्तरप्रदेश,
मामला: एक युवक ने दूसरी जाति की युवती से शादी की। लड़की इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति की पुत्री थी।
फैसला: खाप पंचायत ने घृणित फैसला सुनाया कि लड़के की माँ के साथ बलात्कार किया जाए। ऐसा हुआ भी। लड़के की माँ के साथ बलात्कार हुआ और सबूत मिटाने के लिए उसे जिंदा जला दिया गया।
वर्ष : 2007,
स्थान : करौंरा गाँव, 23 वर्षीय मनोज और 19 वर्षीय बबली को पसंद से शादी करने पर मौत की सजा सुनाई गई थी और दोनों को निर्ममतापूर्वक मार डाला गया। खाप पंचायत के इस खूनी फैसले के खिलाफ अदालत का फैसला आया। यह फैसला इसलिए चर्चा का विषय बन गया कि आज तक किसी भी खाप पंचायत को किसी अदालत ने सजा नहीं सुनाई।
हरियाणा के झज्जर की खाप पंचायत ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय की अवहेलना करते हुए एक प्रेमी जोड़े को गाँव से बाहर खदेड़ दिया।
वर्ष : 2007 में हरियाणा के रोहतक में डीजे बजाने पर पाबंदी लगा दी गई। रूहल खाप द्वार लगाई गई इस पाबंदी का कारण तेज आवाज से दुधारू पशुओं पर असर पड़ना बताया गया।
2007 में ही ददन खाप ने जींद में क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया। खाप पंचायत का तर्क था कि इससे लडके बर्बाद होते हैं, और मैच पर सट्टा लगाते हैं।
हरियाणा के सोनीपत की गोहना तहसील के नूरनखेड़ा गाँव निवासी 70 वर्षीय बलराज ने छपरा (बिहार) निवासी 14 वर्षीय आरती से विवाह कर लिया। नूरनखेड़ा गाँव की खाप पंचायत ने इस बेमेल फैसले को जायज ठहरा दिया।
लगभग दो साल पहले मुजफ्फनगर जिले के हथछोया गाँव में एक ही गोत्र में शादी करने पर युवक-युवती की हत्या कर दी गई।
लगभग पाँच वर्ष पूर्व लखावटी के पास हुई एक पंचायत में प्रेमी जोड़े को बिटौडे में जला दिया गया था। इस हत्याकांड की आवाज तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के पास तक पहुँची, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ।
खाप की माँग आज के संदर्भ में :-
आज खाप पंचायत हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन की माँग कर रही है। उनके अनुसार सरकार 'एक गोत्र' में होने वाली शादियों को अवैध माना जाए क्योंकि एक गोत्र के सभी लड़के-लड़कियाँ आपस में भाई-बहन होते हैं। चाहे कितनी भी पीढ़ियाँ क्यों ना गुजर गई हो! अपनी इसी सोच के चलते उन्होंने मनोज और बबली हत्याकांड के दोषियों को बचाने के लिए हर घर से दस- दस रुपए एकत्र किए। उनके अनुसार, मनोज और बबली एक ही गोत्र के थे इसलिए उनकी हत्या करने वाले दोषी नहीं है बल्कि दोषी मनोज और बबली थे क्योंकि उन्होंने एक ही गोत्र में शादी की!
खाप के विरूद्ध आपका फैसला क्या है?
तेजी से उभरती हुई एक अत्यंत ही भयावह समस्या है खाप। लेकिन आजादी के जश्न मनाते हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक क्या इस गंभीरता को समझ पा रहे हैं? हम जो तालीबानी हुक्म पर आह कर उठते हैं खाप के खूनी फैसलों पर हमारी चित्कार क्यों नहीं निकलती? बिना किसी कसूर के दो प्यार करने वाले जघन्य तरीके से मार डाले जाते हैं और खाप के बेशर्म अट्टहास के बीच दब कर रह जाती है सैकड़ों ‍सिसकियाँ, मर्मांतक कराहटें और घनघोर पीड़ाएँ।
राजनेताओं से अपेक्षाएँ क्यों करें जबकि उनका पूरा का पूरा वोट बैंक इन खाप प्रमुखों के इशारों पर समृद्ध होता है। अगर आप सचमुच प्रगतिशील देश के सभ्य नागरिक हैं तो आप कीजिए फैसला इन खापों के विरुद्ध। ऐसे तुगलकी, तालीबानी और तानाशाही फैसले, इससे पहले कि आप तक फैलकर पहुँच जाए कुरेदिए अपने मन की संवेदनात्मक परत और बताइए क्या होना चाहिए इन खापों का?

ये हुई ना मर्दों वाली बात

देश की साख पर बट्टा लगता देख केंद्र सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में ले ली है और ऑर्गनाइजिंग कमिटी को लगभग निष्प्रभावी कर दिया है। ऑर्गनाइजिंग कमिटी के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी से गेम्स के आयोजन से जुड़े सारे अधिकार छीन लिए गए हैं। कमिटी के सारे लोग अब 10 नौकरशाहों के पैनल को रिपोर्ट करेंगे। इस पैनल के सभी सदस्यों को सीधे पीएमओ ने चुना है। दरअसल, सरकार ने पिछले ही सप्ताह कलमाड़ी के पर कतरते हुए गेम्स के आयोजन की कमान कैबिनेट सेक्रेटरी की अध्यक्षता वाले सेक्रेटरियों के पैनल को सौंप दी थी। लेकिन गुरुवार को इस मामले में सोनिया गांधी के बयान के बाद आनन-फानन हरकत में आई सरकार ने कलमाड़ी को गेम्स ने पूरी तरह से अलग कर दिया। अब वह सिर्फ नाम के लिए ही ऑर्गनाइजिंग कमिटी के चेयरमैन होंगे। सोनिया ने गुरुवार को सभी लोगों से गेम्स को सफल बनाने में सहयोग देने की अपील करते हुए कहा था कि इसके आयोजन के बाद दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
चलो ये तो हुई मर्दों वाली बात, लेकिन जो घोटाले कलमाड़ी व उसके साथ लगे लोगों या रिश्तेदारों के मिले हैं उनकी रिपोर्ट का क्या होगा? क्या यह रिपोर्ट इधर-उधर कर दी जाएगी? या फिर सरकार अपनी इस मर्दों वाली बात को कायम रखते हुए सख्त कदम भी उठाएगी। मेरे मानना है कि सरकार को ऐसा काफी समय पहले कर देना चाहिए था ताकि गेम्स के नाम पर शायद ऐसा नहीं होता।

Wednesday, August 18, 2010

क्या होगा कोम्ॅनवेल्थ गेम्स का

राष्ट्रमंडल खेलों का क्या होगा? इसके बारे में कभी कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक ओर सरकार इसके सफल होने का दावा कर रही है तो वहीं दूसरी ओर इसके शुरू होने से पहले की असंतोषजन समाचार भी प्राप्त हो रहे हैं। आए दिन राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में एक नई बात सुनने को मिलती है। राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में कुछ चकित कर देने वाली जानकारी राजस्थान पत्रिका से प्राप्त हुई। कॉमनवेल्थ गेम्स में हुई वित्तीय गडड़बडियों के चलते यह घोटालों का महाखेल बन गया है। सीवीसी की रिपोर्ट में गेम्स के लिए तैयार 16 प्रोजेक्ट््स में गड़बड़ी की रिपोर्ट का खुलासा होते ही धीरे धीरे गेम्स की तैयारियों के नाम पर हो रही लूट सामने आने लगी। रिपोर्ट से हुआ घोटालों और घपलों के खुलासे का सिलसिला बहुत लंबा है। रिपोर्ट के बाद आयोजन समिति से जुड़े तीन सदस्यों की बलि आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को बचाने के लिए हो चुकी है और टेनिस संघ के कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना को इस्तीफा देना पड़ा है। हालांकि कलमाड़ी अभी भी अपनी खाल बचाए हुए हैं । सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग कलमाड़ी से किनारा किए जाने का पक्षधर है। ऎसे में कलमाड़ी पर भी तलवार लटकती दिख रही है।
अपने लोगों को दिए ठेके
गेम्स की तैयारियों में गड़बड़झाले का सबसे पहले खुलासा सीवीसी की रिपोर्ट में हुआ। सीवीसी की रिपोर्ट में कहा गया कि कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किए जा रहे प्रोजेक्ट्स की बोली में मनमानी वाला रवैया अपनाया गया। बोली में सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए उनको ठेके दिए गए। प्रोजेक्ट्स में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद तो कॉमनवेल्थ गेम्स में घपलों की खबरों की झड़ी लग गई। गेम्स की तैयारियों के लिए बड़े पैाने पर लूट की खबरें आने लगी। यह लूट हर तरीके से हो रही है। ज्यादातर लूट कमीशनखोरी के तौर पर हो रही है।
कीमत से ज्यादा किराया
मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक आयोजन समिति में सबसे ज्यादा घपला किराए पर ली जाने वाली चीजों के नाम पर हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक गेम्स की आयोजन समिति ने जिन मेडिकल उपकरणों को खरीदा उनमें बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। समिति ने जिन छतरियों, मेज, पानी के जग, एयरकंडीशन, कुर्सियों को किराए पर लिया उनकी कीमत किराए से आठ से दस गुना कम है। सूत्रों के मुताबिक गेम्स के उद्घाटन व समापन समारोह में इस्तेमाल होने वाले कार्यक्रम में इस्तेमाल होने वाले गुब्बार पर करीब 48 करोड़ रूपए में खर्च किए जा रहे हैं।
बेनामी कंपनी को दिए पैसे, ई-मेल से छेड़छाड़
समिति ने टेंडर की प्रक्रिया को पूरा किए बिना ही लंदन की एक बेनामी कंपनी को 4.50 लाख पाउंड की रकम सौंप दी और इसके लिए कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड भी नहीं रखा। समिति की ओर से कहा गया कि लंदन स्थित उच्चायोग की सिफारिश पर कंपनी को पैसा ट्रांसफर किया गया था। हालांकि उच्चायोग ने समिति के इन आरोपों को खारिज कर दिया। बाद में इस मामले में समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने अपने पक्ष में एक ई-मेल सार्वजनिक किया। हालांकि इस मामले में कलमाड़ी की ही फजीहत हुई। विदेश मंत्रालय ने अपनी जांच में पाया कि कलमाड़ी ने जिस ई-मेल को पेश किया है उसके साथ छेड़छाड़ की गई है।
4 लाख की ट्रेडमिल का किराया 10 लाख
आयोजन समिति ने जिस ट्रेड मिल को करीब 10 लाख रूपए में किराए पर लिया उसकी कीमत दिल्ली के स्थानीय बाजार में सिर्फ 4 लाख रूपए है। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि किसी को फायदा पहुंचाने के लिए ऎसा किया गया है। हालांकि बाद में आयोजन समिति ने ट्रेडमिल को किराए पर लिए जाने के प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया। समिति ने ट्रेडमिल को बाजार से खरीदने का फैसला किया गया था।
बेटे को दिलाया ठेका
हालिया खबर के मुताबिक कॉमनवेल्थ खेलों के लिए टेनिस टर्फ के निर्माण का ठेका आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना के बेटे को दे दिया गया। आर के खन्ना टेनिस स्टेडियम में 14 सिंथेटिक टर्फ तैयार करने का टेंडर अनिल खन्ना के बेटे आदित्य की कंपनी रिबाउंड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था। लेकिन कंपनी ने गुणवत्ता की परवाह किए बगैर आनन फानन में ही निमार्ण कार्य पूरा करवा दिया। आदित्य ऑस्ट्रेलियन फर्म रिबाउंड ऎस की भारतीय शाखा रिबाउंड फर्म इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ हैं।
लॉन टर्फ खरीदने में भी घपला
टेनिस टर्फ के निर्माण में आए घोटाले के बाद कॉमनवेल्थ के लिए लॉन बॉल टर्फ खरीदे जाने में भी गड़बडियां सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि लॉन बॉल टर्फ के लिए तय कीमत से पांच गुना अधिक कीमत चुकाई गई है। सूत्रों के अनुसार एक लॉन बॉल टर्फ के लिए निर्माण कंपनी को करीब 1.35 करोड़ रूपए चुकाए गए जबकि यह मात्र 27 लाख रूपए में तैयार हो सकता था। सूत्रों के अनुसार 3-14 अक्टूबर तक होने वाले खेलों के लिए आठ टर्फ खरीदी गई हैं। दिल्ली की कंपनी एरोस टर्फ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को टर्फ खरीदे जाने के लिए पांच गुना ज्यादा का भुगतान किया गया है। सूत्रों के मुताबिक नेशनल गेम्स के दौरान एक टर्फ के निर्माण में लगभग 18.37 लाख रूपए का खर्च आया था जबकि कॉमनवेल्थ के लिए यह अचानक बढ़कर 1.35 करोड़ रूपए तक पहुंच गया। झारखंड में होने वाले राष्ट्रीय खेलों के लिए ऑस्ट्रेलियाई ग्रीनगॉज सरफेस लिमिटेड ने वर्ष 2005 में 18,37,500 रूपए में टर्फ का निर्माण किया था। ग्रीनगॉज वही कंपनी है जिसे आईओए ने मंजूरी दी थी।

रणदीव की 'नो बॉल' क्रिकेट पर कलंक

धाकड़ बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग को दाम्बुला में श्रीलंकाई गेंदबाज सूरज रणदीव ने खेल भावनाओं के परे जाकर शतक पूरा नहीं करने दिया। आम दर्शक से लेकर क्रिकेट के पूर्व खिलाड़ियों ने रणदीव की इस हरकत को बचकाना और अपरिपक्व कहा है और किसी भी क्रिकेट प्रेमी को उनकी यह हरकत माफी के काबिल नहीं लगती।
टेलीविजन रिप्ले से यह साफ हो गया कि रणदीव ने जानबूझकर नो बॉल फेंकी थी, जिससे कि सहवाग अपना शतक पूरा न कर पाएँ। सहवाग जैसे खिलाड़ी के लिए शतक कोई मायने नहीं रखता, लेकिन इस पूरे प्रकरण में रणदीव की 'बेइमानी' खुलकर सामने आ गई।
अब तक क्रिकेट इतिहास में कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिनसे क्रिकेट कलंकित हुआ है, लेकिन रणदीव ने जानबूझकर यह 'हरकत' की, जिसे माफ नहीं किया जा सकता। श्रीलंका के इस युवा गेंदबाज ने जानबूझकर 'नो बॉल' फेंकते हुए इतना भी नहीं सोचा कि वे नेट्स पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मैच में गेंदबाजी कर रहे हैं।
रणदीव ने दाम्बुला वनडे में क्रिकेट को कलंकित किया और 30 साल पहले हुई एक घटना याद दिला दी, जिसने खेल भावना को तहस-नहस कर दिया था।
1 फरवरी 1981 को मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच वनडे मैच में ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल ने अपने भाई ट्रेवर चैपल से मैच की आखिरी गेंद अंडरआर्म डालने को कहा। यह पल क्रिकेट इतिहास में सबसे शर्मनाक पलों में से एक है।
मैच की आखिरी गेंद पर न्यूजीलैंड को छह रनों की जरूरत थी और स्ट्राइक पर ब्रायन मैकेंजी थे, लेकिन चैपल ने अंडरआर्म गेंद डालकर खेल भावना को तहस-नहस कर दिया।
इसके बाद ही अंडरआर्म गेंद को क्रिकेट में अमान्य घोषित किया गया। चैपल ने खेल के सारे नैतिक मूल्यों को ताक में रखकर अपने गेंदबाज भाई को अंडरआर्म गेंद फेंकने को कहा, जिसकी क्रिकेट जगत मे बहुत आलोचना हुई।
ऐसा कई बार हुआ है जब खिलाड़ियों ने खेल भावना का परिचय देते हुए विरोधी टीमों या बल्लेबाज, गेंदबाज के रिकॉर्ड बनने में किसी तरह की बेइमानी नहीं की है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है। हाल ही में भारत-श्रीलंका टेस्ट सिरीज के पहले टेस्ट में जब श्रीलंका के गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन टेस्ट क्रिकेट में 799 विकेट ले चुके थे। तब उन्हें 800 विकेट का जादुई आँकड़ा छूने के लिए केवल एक विकेट की जरूरत थी। भारतीय बल्लेबाज चाहते तो दूसरे छोर के गेंदबाज पर ऊल-झलूल शॉट खेलकर अपना विकेट गँवा सकते थे, लेकिन भारतीय बल्लेबाजों ने खेल भावना का परिचय दिया और मुरली को रिकॉर्ड से रोकने के लिए किसी तरह के हथकंडे नहीं अपनाए। इसके अलावा भी ऐसी कई मिसालें हैं जब विरोधी टीम ने किसी खिलाड़ी का रिकॉर्ड बनने से रोकने के लिए खेल भावना का उलंघन नहीं किया।
रणदीव अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में नए हैं, इसलिए हो सकता कि उन्होंने नो बॉल फेंककर वह करने की कोशिश की हो जो अब तक नहीं हुआ, लेकिन ऐसा करके वे क्रिकेट जगत की नजरों में गिर गए। उन्होंने न केवल खुद की छवि खराब की बल्कि श्रीलंकाई क्रिकेटरों का भी सिर झुकाया है।