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Wednesday, July 27, 2011

सेक्स लाइफ को बनाएं बेहतर


अक्सर ऎसा देखने में आता है कि बच्चों के जन्म के बाद पत्नी को सेक्स में पहले जैसी रूचि नहीं रह जाती। जबकि अध्ययन तो बताते हैं कि बच्चों के जन्म के बाद क्लाइमेक्स (चरमोत्कर्ष) की तीव्रता बढ़ जाती है। निम्न बातों पर गौर करें तो पाएंगे ‍कि अध्ययन ही सही हैं।
1. शरीर का बेडौल होना या शेप में न होना कई बार महिलाओं में हीनता की भावना भर देता है। याद रखें शादी और बच्चों के बाद अब आप इस स्तर पर आ गए हैं जहां शायद इन चीजों का इतना महत्व नहीं रह जाता। ईश्वर द्वारा बनाए गए इस अनमोल शरीर में रंग, रूप, आकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप संतुलित खानपान और व्यायाम का बिल्कुल भी ध्यान न रखें।
2. सेक्स में आप क्या चाहती हैं, आपको क्या अच्छा लगता है, इस बारे में जीवनसाथी से खुलकर बात करें।
3. एक-दूसरे के साथ अधिक से अधिक समय बिताएं। टहलने के लिए हो सके तो प्रतिदिन आसपास ही कहीं जाएं या टेरेस पर चहलकदमी करें।
4. साल या डेढ़ साल में शहर से बाहर घूमने जरूर जाएं। यह ब्रेक आपको तरोताजा रखता है। यह आम समस्या है कि आदमी कहता रहता है समय नहीं है, लेकिन इन चीजों के लिए यदि समय नहीं निकालेंगे तो जीवन का नीरस लगना स्वाभाविक है।
5. बाजार में आ रही सेक्स दवाओं आदि का अंधभक्त होकर उपयोग न करें। विज्ञापन आदि से भ्रमित होकर ऐसा लग सकता है कि इनके बिना कुछ कमी सी है। लेकिन प्राकृतिक रूप से भी आप इसका आनंद उठा सकते हैं।
6. मैगजीन्स आदि में प्रकाशित सेक्स से संबंधित आर्टिकल्स या इमेजेस, सीडी आदि का सहारा ले सकते हैं।
7. सप्ताह में कितनी बार सेक्स किया आदि बातों पर ध्यान न देते हुए यह ध्यान रखें जब भी करें इसे पूरी तरह से एंज्वॉय करें तो आप पाएंगे कि इसमें संख्‍या का विशेष महत्व नहीं है। सप्ताह में 4 बार से ज्यादा मजा आपको 2 बार में भी आ सकता है।
8. यदि पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं। समयाभाव और थकान के कारण सेक्स लाइफ खत्म जैसी हो जाती है। ऎसे में बेहतर होता है कि सुबह उठकर फ्रेश मूड में सेक्स का आनंद उठाएं। या मौका मिलने पर साथ नहाने भी जा सकते हैं।
9. पोजीशन वगैरह चेंज करके भी सेक्स से अच्छा आनंद मिल सकता है। इस बारे में भी दोनों खुलकर बात करें।
10. सेक्स दोनों को शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी करीब लाता है। इस जुड़ाव से दांपत्य जीवन मजबूत होता है।
11. रतिक्रिया (सेक्स) को कभी भी काम की तरह या खाना खाने की भांति न निपटाएं। भूख लगी है तो खाना खाना ही है। काम की तरह निपटाने से जल्द ही इससे ऊब जाएंगे।
12. बेहतर सेक्स के लिए तनावमुक्त होना बहुत जरूरी है। इससे आप बहुत आरामदायक फील करेंगे। कम से कम इस समय अपनी सारी चिंताओं, समस्याओं को एक तरफ रख दें। सभी कुछ भूलकर बस एक-दूसरे में खो जाएं। तनाव के समाधान के लिए आपके पास इसके अतिरिक्त भी ढेर सा समय है।
सावधानी रखने वाली सबसे जरूरी बात कि किसी भी हालत में नशे का सहारा न लें। सिगरेट या शराब में अपने को डुबोते हैं तो मान कर चलें आप अपना और नुकसान ही कर रहे हैं। नशे की लत से आपको इन समस्याओं से छुटकारा तो नहीं मिलेगा उलट ये बढ़ जाएंगी। इन छोटे-छोटे उपायों को आजमाकर आपका सेक्स जीवन लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है और शादी के कई वर्षों बाद
भी इसका आनंद उठाते रहेंगे।

‘खाप’ बनाम ‘खाप’ के निहितार्थ चन्द यक्ष प्रश्न


-राजेश कश्यप
उत्तरी भारत की खाप-प्रथा के खिलाफ अमरीश पुरी द्वारा अभिनीत फिल्म ‘खाप’ आगामी २९ जुलाई को रीलिज होने जा रही है। क्योंकि फिल्म अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे पर बनी है, तो फिल्म के निहितार्थ कुछ तथ्यों पर गहन मन्थन करना अत्यन्त अनिवार्य हो जाता है। चूंकि सिनेमा, समाज का दर्पण होता है और उसने खाप को केन्द्रित करके पूरी फिल्म का निर्माण किया है तो निश्चित तौरपर मसला कोई मामूली नहीं है। फिल्म के प्रोमो देखकर पूरी फिल्म का सारांश सहज स्पष्ट हो जाता है। फिल्म मीडिया रिपोर्टों, कुछ कानूनी फैसलों और प्रकाश में आई आWनर किलिंग की सनसनीखेज घटनाओं के आधार पर बनाई गई है। साधारण तौरपर तो फिल्म का मुख्य मुद्दा मात्र गोत्र के नाम पर होने वाली कथित प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या का विरोध करना है। क्या वास्तव में ही इतना-सा मसला है? नहीं, मसला इससे कहीं अधिक गंभीर है। वरना खाप-पंचायतें फिल्म का इतना मुखर विरोध कदापि नहीं करतीं।
अगर फिल्म की गंभीरता से विवेचना की जाए तो कई विवादास्पद पहलू नजर आएंगे। सबसे पहले फिल्म के मुख्य मुद्दे ‘सगोत्र विवाह की पैरवी’ को लेते हैं। यह बिल्कुल सही है कि हमारे देहात में ‘सगोत्र विवाह’ को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा रहा है। ऐसा केवल वर्तमान दौर में नहीं हो रहा है। यह तो सदियों से चली आ रही परंपरा और रीति-रिवाज है। ऐसा क्यांे है, ‘गोत्र’ क्या हैं और इस मान्यता के पीछे क्या भेद है, क्या इस बारे में आलोचकों ने कभी गहराई से सोचा है? शायद नहीं। देहात में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, ‘गौती भाई, बाकी अश्नाई’ अर्थात गौत्र वाले सभी भाई हैं और बाकी सभी रिश्तेदारी से हैं। इसका मतलब यह है कि ‘गौत्र’ अपने मूल दूध-खून से निर्मित एक परिवार का नाम है। क्या एक खून-दूध से जन्में हुए व्यक्तियों का आपसी रिश्ता बहन-भाई का नहीं बन जाता? यदि हाँ तो देश का कौन सा कानून या सभ्य समाज भाई-बहन को प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी बनाने की इजाजत दे सकता है? क्या एक व्यक्ति की संतानों की संतानें और उनकीं संतानें आगे दो-चार पीढ़ियों के बाद अपने खूनी-रिश्तों से मुक्त हो जाएंगी? कदापि नहीं। तो फिर ‘सगौत्र’ अर्थात एक ही गौत्र यानी आपसी बहन-भाईयों का विवाह कैसे संभव हो सकता है? यहां यह स्पष्ट करना अत्यन्त अनिवार्य है कि ‘सगौत्र विवाह’ और ‘अंतरजातीय विवाह’ में जमीन-आसमान का अंतर है। पहले तो देहात में जाति बन्धनों को अटूट बनाया गया था, लेकिन बदलते दौर में यह अटूट नहीं रह गए हैं और संभवत: खापों ने भी अंतरजातीय विवाहों को दबी जुबान में अपनी सहमति दी हुई है। अब यदि सिर्फ दूध-खून के रिश्ते को छोड़कर अन्य कहीं भी शादी करने की स्वीकृति मिल रही है तो फिर विवाद किस बात का?
फिल्म में खापों को खूंखार और हैवान रूप में दिखाया गया है। अब फिर सवाल उठता है कि क्या कोई शहरी व्यक्ति ‘खाप’ के अर्थ, उनकी प्रकृति और उनके इतिहास के बारे में जानता है? यदि नहीं, तो उन्हें स्वयं खापों के बीच बैठकर जानना चाहिए, सिर्फ कुछ अल्पबुद्धिजीवियों की मनघड़ंत लेखनी को पढ़कर अथवा सुनकर अपनी राय नहीं बनानी चाहिए। खाप का प्रचलन महाराजा हर्षवद्र्धन काल से चला आ रहा है और विदेशी आक्रान्ताओं व हमारी सभ्यता एवं संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके पश्चिमी संस्कृति को लादने वाले षड़यंत्रकारियों के खिलाफ डटकर लोहा लेने तथा अपने राजा-महाराजाओं व देश के मान-सम्मान के लिए मर-मिटने की पहचान रखती आई हैं, खाप पंचायतें। यह दूसरी बात है कि आधुनिक खाप पंचायतों में कुछ सिरफिरे, गैर-जिम्मेदार, असामाजिक तत्व और संकीर्ण राजनीतिक प्रवृति के लोग खापों के रहनुमाओं का मुखौटा पहने हुए हैं। ऐसे में मुद्दा खापों के गौरवशाली अतीत पर कीचड़ फेंकने के बजाय, खापों में आई विकृतियों को समूल नष्ट करने का आन्दोलन चलना चाहिए। स्वयं खाप प्रतिनिधियांे को भी आत्म-मंथन करना चाहिए कि उनके नेतृत्व में गौरवशाली खाप परंपरा के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह क्यों लग रहे हैं?
फिल्म के पोस्टर में ग्रामीण बुजुर्गों द्वारा हाथ में पकड़ी हुई छड़ी को विषैले नाग के फन में चित्रित करके दिखाया गया है। यह चित्रण करते समय किसी ने क्या यह तनिक भी सोचा कि इस छड़ी का क्या मतलब है और इसकी क्या गरिमा है? दरअसल यह छड़ी, देहात में ‘डोगा’ के नाम से जानी जाती है और यह बुजुर्गों के सम्मान की प्रतीक होती है। किसी भी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा एवं मान्यता के तहत जिस चीज को सम्मानजनक स्थान दिया गया हो, उस पर घिनौना प्रहार करना, क्या आपराधिक श्रेणी में नहीं आता है? यदि देश के सम्मान की प्रतीक किसी भी चीज से छेड़छाड़ करके विकृत अथवा आपत्तिजनक रूप दिया जाए तो क्या वह गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आता है? तो फिर ग्रामीण समाज के सम्मान की प्रतीक छड़ी को विषैले नाग के रूप में प्रदर्शित करके क्या फिल्मकारों ने भयंकर भूल नहीं की है?
इसके बाद फिल्म एक अत्यन्त गंभीर प्रश्न खड़ा करती है, कि क्या आज भी प्यार करने की सजा, मौत है? प्रश्न जितना पेचीदा है, उत्तर उतना ही आसान। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हमेशा से ही समाज की प्रचलित परंपराओं और रीति-रिवाजों के आधार पर कानूनों का निर्माण होता आया है अर्थात् परंपराओं से कानून बने हैं, न कि कानूनों से सामाजिक परंपराएं बनी हैं। जब सदियों से समाज की परंपरा व रिवाज रहा हो कि खून-दूध से जुड़े सदस्य और गाँव व गौहाण्ड (साथ लगते गाँव) के लोगों के बीच एक पारिवारिक व भाईचारे का रिश्ता रहेगा तो इसे गैर-कानूनी कैसे ठहराया जा सकता है? जब देहात के व्यक्ति को गाँव-गौहाण्ड अथवा गौत्र की कोई लड़की मिलती है तो वह उसे सम्मान के रूप में दस रूपये देकर आशीर्वाद देने और अपनी बहन-बेटी का दर्जा देने जैसी परंपराओं के निर्वहन में अपना गौरव समझता हो, तो भला वह गंवार कैसे ठहराया जा सकता है? और वह अपनी गौरवमयी सामाजिक परंपराओं से हो रही खिलवाड़ पर अपना विरोध दर्ज करवाता है तो उसे जानवर और हैवान की संज्ञा देने का क्या आधार बनता है?
अब रही प्यार करने वालों की बात। प्यार क्या होता है? क्या पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में पथ-भ्रष्ट हुई आधुनिक युवा पीढ़ी को पता है? आजकल के युवा सिर्फ विषय-वासना और शारीरिक भूख मिटाने वाली पाश्विक प्रवृति को ही ‘प्रेम’ का आवरण दे रहे हैं। पाश्विक प्रवृति के चलते वह अपने-पराए, अच्छे-बुरे आदि हर तरह के ज्ञान को भूल चुका है। उदाहरण के तौरपर हरियाणा में रोहतक जिले के गाँव कबूलपूर की घटना को लिया जा सकता है। गाँव की एक लड़की सोनम ने अपने सामने वाले घर में रहने वाले लड़के, जिसे वह सार्वजनिक रूप में भाई के तौरपर संबोधित करती थी, के साथ अपनी वासना के वशीभूत होकर नाजायज सम्बंध बनाए। पता लगने पर, परिवार वालों ने उन्हें समझाया। उनपर कोई असर पड़ता न देख, परिवार वालों ने लड़की को रोहतक के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रावास में भेजा। वहां पर भी इस रासलीला में कोई कमी नहीं आई। अंतत: दु:खी होकर उसे वापिस घर पर रखा गया। जब परिवार में काफी विरोध बढ़ा तो उस लड़की ने १४ सितम्बर, २००९ की रात को पहले अपने परिवार के सभी सात सदस्यों माता-पिता, दादी और चार बहन-भाईयों को खाने में बेहोशी की दवा खिलाई और फिर अपने कथित प्रेमी के साथ मिलकर परिवार के सभी सदस्यों को बड़ी बेरहमी से मौत की नींद सुला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। इस भयंकर और हृदय विदारक घटना को अंजाम देने के बाद परिवार की लाशों के बीच लेटकर उन दोनों ने पूरी रात खुलकर सेक्स किया। इससे और अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि कानून की पकड़ में आने के बावजूद उस लड़की ने सीना ठोंककर बयान दिया कि उसे अपने इस कृत्य पर किसी तरह का कोई मलाल नहीं है। क्या आधुनिक युवा पीढ़ी द्वारा थोपे गए इस विकृत पैशाचिक विषय-वासना को एक सभ्य समाज अपनी स्वीकृति दे सकता है? क्या पे्रम के नाम पर ऐसे कुसंस्कारी कुसंतानों के कुकर्मों पर समाज की मान-मर्यादाओं को स्वाहा किया जा सकता है? मेरे हिसाब से इसका जवाब देने की आवश्यकता नहीं है।
देहात में प्यार करने को बुराई नहीं समझा जाता है। यदि कायदे-कानूनों के दायरे में रहकर कोई प्यार-प्रेम करता है तो समाज उसका सम्मान करता है। लेकिन रीति-रिवाजों को तोड़कर पाश्विक आचरण करना, उन्हें तनिक भी नहीं भाता है। ऐसे में एक पारिवारिक इकाई से लेकर, पड़ौसी, ग्रामवासी, रिश्तेदारी, गौत्र और खाप जैसी सामाजिक इकाईयां तक वासना के वशीभूत सामाजिक मर्यादाओं से खिलवाड़ करने वाले युवकों एवं युवतियों को बड़े लाड़-प्यार से समझाया जाता है। घर के बड़े-बुजुर्ग अपने स्वाभिमान की प्रतीक पगड़ी उनके पैरों में रखकर अच्छे-बूरे का भेद समझाने की कोशिश करते हैं और यहां तक माताएं अपने दूध का वास्ता तक देती हैं, लेकिन तब भी कथित पे्रमी-प्रेमिकाओं के सिर से वासना का भूत नहीं उतरता है। जिस माता-पिता ने उन्हें बड़े कष्टों के साथ पाला-पोषा हो, खून-पसीना एक करके उन्हें पढ़ाया लिखाया हो, उनके बड़े-बड़े नाज नखरे उठाए हों, उनसे कुछ अभिलाषाएं एवं उम्मीदें पाल ली हों तो ऐसे में उनपर क्या बीतती होगी, क्या कभी किसी ने इस बारे में तनिक भी सोचा है? समाज में उन्हें किन-किन कटाक्षों को झेलना पड़ता है, उसका किसी ने जरा सा भी अहसास किया है? जब वे अपने कलेजे के टूकड़े को बुरी मौत मरते देखते हैं तो क्या उससे बढ़कर अभिशाप उनके लिए और कोई हो सकता है? हालांकि कोई भी खून-खराबे की पैरवी नहीं करता है। यदि कोई आWनर किलिंग के नाम पर किसी तरह का खून खराबा करता है तो वह कानूनी सजा भुगतता है।
इसके बाद फिल्म के मूल प्रश्न का शेष हिस्सा है प्यार करने की सजा, मौत? कब तक? वर्तमान समीकरणों के अनुसार इसका बेहद आसान सा जवाब है, ‘हिन्दू विवाह अधिनियम, १९५५ में संशोधन होने तक’। यदि इस विवाह अधिनियम की धारा ३ के अन्तर्गत उपधारा (छ) की उपधारा (पअ) के बाद संशोधन करके यह जोड़ दिया जाए कि ‘एक ही गौत्र या माँ के गौत्र, एक दूसरे की साथ लगती रिहायश, तथा भाईचारे का गाँव में हो, चाहे वह किसी गोत्र या जाति का हो, या एक दूसरे की रिहायश उस गाँव में हो, जहां पर खासी तादाद में एक दूसरे गौत्र के लोग रहते हों तो उन्हें प्रतिसिद्ध नातेदारी की डिग्रियों के अन्दर माना जाएगा।’ सिर्फ इतना सा संशोधन इस तरह के कथित आWनर किलिंग के नाम पर हो रहे खून खराबे पर अंकुश लग सकता है। क्योंकि जब समाज की संस्कृति व रीति-रिवाज के खिलाफ होने वाली शादियों को कानून इजाजत ही नहीं देगा तो निश्चित तौरपर अनैतिक प्रेम संबंधों की घटनाओं मंे कमी आएगी और यदि इसके बावजूद यदि कोई गैर-कानूनी शादी करता है तो माता-पिता व समाज कानून हाथ में लेने की बजाय, उलटा कानून का ही सहारा लेगा। इससे समाज व कानून के बढ़ते टकरावों की समस्या से भी निजात मिल सकेगी।
अब रहा खापों द्वारा फिल्म का विरोध करने का मसला। तो खापों को ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की तर्ज पर प्रदेश में फिल्म के प्रदर्शन पर ऐतराज नहीं करना चाहिए। चूंकि सिनेमा अभिव्यक्ति का एक साधन है तो उस पर अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए। यदि फिल्म के किसी पक्ष पर किसी को कोई ऐतराज है तो कानूनी सहारा लिया जा सकता है। अपनी ताकत के बलपर फिल्म प्रदर्शित करने से रोककर, खापें अपनी नकारात्मक छवि ही बनाएंगी, उससे उसका भला होने वाला नहीं है। खाप प्रतिनिधियों को पता होना चाहिए कि इस तरह विरोध करके तो फिल्म को और ज्यादा प्रचार मिलेगा। इससे पहले पंजाब की पृष्ठभूमि पर बनी प्रेम कहानी ‘आक्रोश’ प्रदर्शित हुई थी, वह कब आई और कब गई, क्या किसी को पता चला? तो फिर ‘खाप’ फिल्म पर विरोध जताकर अपनी छवि को नकारात्मक बनाने में कौन सी समझदारी है? वैसे समझदारी तो इसी में है कि खाप पंचायतों द्वारा अपने वैचारिक पक्ष को मजबूत किया जाए और अपनी आक्रामक शैली पर अंकुश लगाकर धैयै एवं संयम का परिचय देते हुए तार्किक आधार पर अपने रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का बोध अज्ञानी व अबोध लोगों को करवाया जाए।

Thursday, June 16, 2011

बच्चों के साथ ज्यादती है डराना-धमकाना


अक्सर माता-पिता अपने जिद्दी बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए उन्हें डांटते हैं और कभी-कभार तो पिटाई भी कर देते हैं। भारत में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी बच्चों को अनुशासित बनाए रखने के लिए उनके साथ सख्त बर्ताव किए जाने की खबरें पढऩे को मिलती रहती हैं। हाल ही में यूनिसेफ के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि हर चार में से तीन बच्चे माता-पिता के हिंसक व्यवहार और गुस्से को झेलते हैं। कई बच्चों को शारीरिक दंड भी दिया जाता है।
भारत में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक बच्चों को अनुशासित करने के लिए उन पर चिल्लाना या दंड देना लगभग हर माता-पिता के लिए सामान्य बात है। उनका मानना है कि बच्चों को अगर अनुशासन में रखना है तो यह सब करना ही पड़ता है। कई अध्यापक तो आज भी बच्चों की पिटाई जरूरी मानते हैं मगर स्कूलों में इस पर पाबंदी के कारण अब वे ऐसा नहीं कर पाते।
मानसिक तरीके से बच्चों को अनुशासित करने के तरीके में जोर-जोर से उसका नाम लिया जाता है और फिर काफी बुरा-भला सुनाया जाता है। धमकी देना भी आम बात है। यह न सिर्फ भारत मिस्र, ब्राजील, फिलीपींस और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी होता है। भारत में 70 से 95 फीसदी अभिभावक अपने बच्चों पर चीखते-चिल्लाते देखे गए हैं। कुछ समुदायों में बच्चों को सार्वजनिक तौर पर धमकी भी दी जाती है कि उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जाएगा या हॉस्टल भेज दिया जाएगा।
एक अध्ययन के अनुसार बच्चों को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने के साथ-साथ शारीरिक दंड देना भी आम बात है। अगर ब्राजील और अमेरिका की बात करें तो वहां बच्चों की कमर के निचले हिस्से पर पिटाई की जाती है। जबकि भारत में बच्चों को थप्पड़ मारना आम बात है। छोटे शहरों की ज्यादातर माएं बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए काफी आक्रामक हो जाती हैं। करीब 42 फीसदी माताएं तो शारीरिक दंड भी देती हैं। चीन में 48 फीसदी बच्चों (जो 14 साल से कम उम्र वाले हैं) को बोल कर अनुशासित किया जाता है वहीं 23 प्रतिशत बच्चों को शारीरिक दंड दिया जाता है। पंद्रह फीसदी बच्चे कठोर दंड पाते हैं।
बच्चों पर चीखना-चिल्लाना और उनके साथ मारपीट करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं जैसे माता-पिता का ज्यादा पढ़ा-लिखा न होना, परिवार का निरक्षर होना, घर का माहौल खराब होना, बच्चों में किशोरावस्था के दौरान जिद्दीपन, शराबी पति का गाली-गलौज करना और घर के दूसरे सदस्यों से बुरा बर्ताव करना। इन सबका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। भारत में करीब 39 फीसदी बच्चों को अनुशासित करने के लिए शारीरिक दंड दिया जाता है। इक्यासी प्रतिशत बच्चे मौखिक और मानसिक तौर पर दंडित किए जाते हैं। दस फीसदी से भी कम बच्चों को सामान्य तरीके से बात कर अनुशासित बनाने की कोशिश की जाती है। इसी तरह 89 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अनुशासित करने के लिए माता-पिता कठोर बर्ताव करते हैं।
यूनिसेफ चाइल्ड प्रोटेक्शन के सर्वे में यह बात सामने आई है कि घर में बच्चों साथ हो रहे बुरे व्यवहार को अक्सर छिपाया जाता है। अध्ययन के अनुसार अगर कोई यह माने कि वह अपने बच्चों के साथ घर में बुरा व्यवहार करता है या वह बच्चों से बात करते समय हिंसक हो उठता है तो यह स्थिति न सिर्फ परेशानी का कारण बनेगी बल्कि समाज में परिवार की बदनामी भी होगी। बच्चों के लिए थोड़ी सी सजा उनके कोमल बचपन के लिए हानिकारक होती है। वह उनके विकास में बाधा डालती है। भविष्य में उनमें हिंसात्मक प्रवृत्ति बढ़ाने में भी मदद करती है। बच्चे की हंसी उड़ाना, उसे धमकाना आदि उनके बचपन के साथ ज्यादती है।

बच्चों के ऐसा करने के लिए हम जिम्मेदार


बच्चे जोकि देश का भविष्य हैं। आज के दौर में बच्चे अपने आप को एक दूसरे से आगे निकलने की पूरी-पूरी कौशिश करते हैं। यह नहीं है कि हम उन्हें कहे की पड़ौसी का बच्चा ऐसा है, उसका बच्चा ऐसा है तो यह उनके साथ ज्यादती होगी, क्योंकि जब हम अपने बच्चों के सामने दूसरे की बढ़ाई करते हैं तो इस बात का बच्चों की दिमाग पर काफी गहरा असर पड़ता है औैर यह असर काफी हद क नुकसान दायक ही सिद्ध होता है।
बच्चों को स्कूल जाने से पूर्व औैर स्कूल आने के बाद माता-पिता से भी अध्यापकों की बजाय काफी कुछ सिखने को मिलता है। मैं मानता हूं कि बच्चे ज्यादातर समय स्कूल या फिर स्कूल के दोस्तों के साथ बिताते हैं। बच्चे स्कूल में होते हैं तो अध्यापक ये नहीं सिखाते कि बच्चों घर जाते ही माता-पिता को जी, आप न करें और उन्हें तू कहकर बोले। वे नहीं सिखाते ही बच्चों गलत तरीका की सबसे बेहतरीन तरीका है, एक-दूसरे से लडऩा ही अच्छा है, लड़ाई के समय गाली-गलौच करना सही है।
ऐसा बिल्कूल भी नहीं है, बल्कि अध्यापक बच्चों को आज के समय में केवल-औैर-केवल उन्हें पढ़ाते ही हैं वे उन्हें बोलना, उठाना, बैठना, दोस्ती करना आदि कैसे करना चाहिए। आज समय में अध्यापक केवल स्कूल में अनुसाशन, शांत करना और अच्छे अंकों से पास होना ही सिखाया जाता है। यदि हम अपने बच्चों को आप, जी, दोस्त कैसे हों, पढऩा कैसे हो आदि बातों के बारे में हम ही उन्हें यह जानकारी बेहतर दे सकते हैं।
मैंने देखा भी है और सुना भी है जब मैं गांव से दूर स्कूल के लिए जाता था तो वहां शहर में जब माताएं अपने बच्चों को स्कूल बस में बैठाने के लिए घर से निकलती थी तो उन्हें खुशी महसूस होती थी। एक बार एक बच्चे ने मां के साथ जाते हुए किसी पड़ौसन को कुछ गलत कर दिया, जरा सोचो बच्चा बिल्कुल छोटा था और करीब छ: साल का ही होगा, ऐसे में मां को क्या करना चाहिए उसे मारना, धमकाना या फिर समझाना। बच्चे की मां कहती है कि बेटा ऐसा नहीं बोलते, वो आप से बड़ी हैं और उन्हें ऐसा नहीं कहा जाएगा। उनकी माता ने कहा कि बेटा वो आप से बड़ी हैं। इसमें मां अपने बच्चे को आप कहती है औैर बच्चा शांत होकर साथ-साथ हो लेता है।
बच्चे के दिमाग में आप शब्द चला जाएगा और वह सभी को आप कहकर बोलने लगेगा और इस बात से पता चलता है कि बच्चा लायक हो जाएगा। कहा भी गया है कि आप कहोगे आप कहलाओगे यदि तू कहोगे तो तू कहलाओगे। हमें सिखाना होगा कि दोस्त कैसे चुने जाएं, क्या बोलना चाहिए औैर क्या नहीं। हमें ही आज के समय में बच्चों के बारे में कुछ सोच समझकर कदम उठाना चाहिए जैसे :-
बच्चों को कभी-भी इतना अधिक नहीं डराना या धमकाना चाहिए वे बात उनके दिमाग में बैठ जाए।
अपने बच्चे के सामने गुस्से से लाल-पीले होकर दूसरे बच्चों से तुलना नहीं करनी चाहिए।
बच्चे की जिंदगी के लिए कोर्ई बड़ा कदम उठाने से पहले उससे चर्चा जरूर करने की जरूरत है औैर वह इसके बारे में क्या सोचना है।
बच्चों पर ऐेसे काम ना थोपें जोकि उनके लायक ना हों या फिर बसकी बात ना हो।
बच्चा कक्षा में फेल हो जाता है औैर रोता है, हमें चाहिए की उस डराने या मारने की बजाय उसका हौंसला बढ़ाना चाहिए।
यदि बच्चा किसी भी प्रकार की जीद करता है तो उसे प्यार से बैठकर समझाना चाहिए, प्यार से समझाना उससे दिमाग को शांति मिलेगी और वह समझ जाएगा।

Wednesday, June 8, 2011

ऐसे मिलेगा देश की जनता को न्याय



आज हरिद्वार में अनशन पर बैठे बाबा रामदेव की हालत गंभीर हुई और उधर एक दिन के लिए महात्मा गांधी की समाधी पर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे में घोषणा कर दी कि यदि सरकार हमारे साथ नहीं चलेगी तो देश को आजाद कराने के लिए एक और आजादी की जंग का ऐलान कर दिया। यह आजादी की जंग का दिन 16 अगस्त रखा गया है। अन्ना ने कहा कि 4 जून की रात को रामलीला मैदान में केवल गोलियां ही नहीं चली बाकी सब कुछ हुआ और उन्होंने इसे जलियावाला कांड का नाम दिया है। अन्ना का एक दिन का अनशन और बाबा रामदेव का चल रहा अनशन अभी भी सरकार के लिए किसी जवालामुखी के कम नहीं है। सरकार शायद हाथ-पर-हाथ धरे बैठी है और स्वयं मौन होकर प्रैस प्रवक्ताओं और सचिवों को आगे कर अपनी बात कर रही है, लेकिन जब से बाबा रामदेव मैदान में उतरे हैं तभी से लेकर आज प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्षा ने इस विषय में कोई बात नहीं की। जब सरकार मौन बैठी है तो सुप्रीम कोर्ट ने देश की सुध ली और सरकार को रामलीला मैदान में हुए कांड के बारे में दो हफ्ते का समय दे डाला है। अब दो बड़ी घटनाओं को इस देश को इंतजार है एक जो कि सरकार दो हफ्ते के बाद जवाब क्या देगी और दूसरा अन्ना हजारे की आजादी की जंग का ऐलान क्या-क्या रंग लाता है। आज पूरे देश में सरकार की थू-थू हो रही है। हर कोई चाहता है कि सरकार को केंद्र से बदल डालो या फिर सरकार पूर्णं रूप से अन्ना और बाबा रामदेव का साथ दे और पूरे भारत देश को भय, भ्रष्टाचार और कालेधन के निजात मिले और फिर से भारत देश सोने की चिडिय़ां कहलाए।